बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

शरद पूर्णिमा :- पंडित कौशल पाण्डेय 9968550003

#शरद पूर्णिमा :- पंडित कौशल पाण्डेय



अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। आइये जानते हैं शरद पूर्णिमा का महत्व व व्रत पूजा विधि के बारे में।
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज संस्था के माध्यम से शिव शक्ति मंदिर सी-8 यमुना विहार में आज सत्संग के माध्यम से शरद पूर्णिमा महोत्सव के बारे में ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पाण्डेय ने भक्तो को बताया की आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं यह पर्व बुधवार  को मनाया जायेगा , ।भारतीय  धर्मशास्त्रों में इस दिन को   'कोजागर व्रत' व 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केवल  आज के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है , आज के दिन ही भगवान श्री  कृष्ण ने रासोत्सव किया था , ऐसी मान्यता है की इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है । इसलिए आज के दिन खीर बनाकर रात्रि में चन्द्रमा की छाया में रखा जाता है जिससे अमृत की बुँदे इस खीर में प्रवाहित होकर इस महाप्रसाद को पानेवालो को आरोग्य प्रदान करती है .

 पंडित कौशल पाण्डेय जी ने शरद पूर्णिमा को कैसे मनाएँ इसके बारे में बताया की सोमवार को  प्रात: काल स्नान करके मंदिर जाये वहां विधिवत देवाधिदेव शिव जी और भगवान श्री कृष्ण  का पूजन करना चाहिए और  रात्रि के समय खीर बनाने के लिए जहाँ तक संभव हो गाय का  दूध ,घी ,चीनी , पंचमेवा, गिलोय की टहनी  के साथ एक जड़ी जिसे चिरमिटा कहते है इसके पंचांग को लेकर खीर बनाना चाहिए और  अर्द्धरात्रि के समय चन्द्रमा  को भोग लगाकर  रात में  खीर से भरा बर्तन खुली चांदनी में रखकर दूसरे दिन इस महाप्रसाद का सेवन करना चाहिए
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल  पाण्डेय ने शरद पूर्णिमा को वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार बताया की गौमाता के दूध  में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है साथ गिलोय और चिरमिटा युक्त खीर का सेवन से यह हमारे शरीर के किटाणु को नस्ट करता है . इसी कारण से प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान बताया है जिससे  यह परंपरा विज्ञान पर भी आधारित है।
 शरद पूर्णिमा की रात दमा, सर्दी , जुकाम , नजला आदि रोगों से पीड़ित रोगियों के लिए एक वरदान बनकर आती है इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति  अगर रात्रि १० से १२ तक खुले स्थान में चंद्रमा की शीतल छाया ग्रहण करता है और प्रातः खाली पेट इन दिव्य औषधि  से बनी खीर सेवन करता  है तो इन सभी रोगों से बचा जा सकता है 


सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

शारदीय नवरात्री का महापर्व :- पंडित के एन पाण्डेय (ज्योतिष विषेशज्ञ ) +919968550003





इस वर्ष नवरात्री का महापर्व आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ हो रहा है। आज के दिन ही कलश स्थापना होगी। कलश की स्थापना उत्तर पूर्व दिशा (ईशान कोण) की ओर ही संपन्न करें।

शास्त्र में वर्णित है कि- 
"शशि सूर्ये गजारुढ़ा शनिभौमे तुरंगमे, गुरौ शुक्रे च दोलायां,बुधे नौका प्रकीर्तिता।"
मां दुर्गा के तीन स्वरूप हैं, महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती इसलिए इसे त्रिशक्ति के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रों में विशेष रूप से देवी की पूजा, पाठ, उपवास, भक्ति की जाती है।

नवरात्री का अर्थ नौ रातें होती है. इन नौ रातों में माँ दुर्गा के नौ रुपों की पूजा होती है ,माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के इन्हीं नौ दिनों पर मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है वे हैं –
पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्माचारिणी, तीसरा चन्द्रघन्टा, चौथा कूष्माण्डा, पाँचवा स्कन्द माता, छठा कात्यायिनी, सातवाँ कालरात्रि, आठवाँ महागौरी, नौवां सिद्धिदात्री।
माँ दुर्गा देवी के नौ रुपों की पूजा की जाय तो मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.माता की कृपा पाने के लिए नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ का पाठ करना चाहिये. दुर्गा सप्तशती में बताये मंत्रों और श्लोकों का पाठ करने मात्र से माँ की कृपा बनी रहती है ,
इन नौ दिनों के दौरान देवी की आराधना करने वाले भक्तों को ब्रह्माचर्य पालन का पालन करना चाहिए. ब्रह्मचर्य का पालन कर मां भगवती की भक्ति करने वालों से मां जल्द खुश होती हैं और उनकी सारी मनोकामनाओं को पूरा करती है.
ध्यान देने योग्य बात :
नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अतः नवार्ण नवों अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' है।नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए।
ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर जब सक्रिय हो जाते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है। आइए जानें मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र और उनसे संचालित ग्रह
1 नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्र' को की जाती है
2 दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है।
3 तीसरा अक्षर क्लीं है, चौथा अक्षर चा, पांचवां अक्षर मुं, छठा अक्षर डा, सातवां अक्षर यै, आठवां अक्षर वि तथा नौवा अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करता है।
मां दुर्गा की पूजा के दौरान भक्तों को कभी भी दूर्वा, तुलसी और आंवला का प्रयोग नहीं करना चाहिये.
मां दुर्गा की पूजा में लाल रंग के पुष्पों का बहुत महत्व है. गुलहड़ के फूल तो मां को अति प्रिय हैं. इसके अलावा बेला, कनेल, केवड़ा, चमेली, पलाश, तगर, अशोक, केसर, कदंब के पुष्पों से भी पूजा की जा सकती है
मनोकामना सिद्धि हेतु निम्न मंत्र का यथाशक्ति श्रद्धा अनुसार 9 दिन तक जप करें:-
”ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥“
कुन्जिका स्तोत्रं :-
श्री दुर्गा सप्तसती में वर्णित अत्यंत प्रभावशली सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ इस सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र का नित्य पाठ करने से संपूर्ण श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का फल मिलता है ..
यह महामंत्र देवताओं को भी दुर्लभ नहीं है , इस मंत्र का नित्य पाठ करने से माँ भगवती जगदम्बा की कृपा बनी रहती है ..
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत्‌॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्‌॥2॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥4॥
अथ मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
॥ इति मंत्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन ॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥2॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥ 4॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥5॥
धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे॥
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
। इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।
|| ॐ तत्सत ||
नवरात्र में देवी पूजा करने से अधिक शुभत्व की प्राप्ति होती है। देवी की भक्ति से कामना अनुसार भोग, मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
चैत्र मास के नवरात्रि में 9 दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन के साथ यह पर्व सम्पन्न होता है. देवी भावगत के अनुसार नवमी में व्रत खोलना चाहिए।
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज " की तरफ से आपको और आपके परिवार को नवरात्री पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं .
" माँ दुर्गा " आपको शांति , शक्ति , संपत्ति , संयम , सादगी ,सफलता ,समृद्धि , सम्मान, स्नेह और स्वास्थ्य जीवन प्रदान करे .
पंडित के एन पाण्डेय ( कौशल )+919968550003

बुधवार, 2 नवंबर 2016

दीपावली विशेषांक - पंडित कौशल पाण्डेय 09968550003

#दीपावली विशेषांक  - पंडित कौशल पाण्डेय


कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन दीपावली का महापर्व हर्षोलास के साथ मनाया जाता हैं, 
दीपावली प्रकाश पर्व है। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय का द्योतक है। अमावस्या की रात्रि में दीपमालाओं की रोशनी अंधकार के प्रति प्रकाश के संघर्ष एवं विजय का संकेत है, क्योंकि आज के दिन ही प्रभु श्री राम रात्रि में अयोध्या वापिस आये थे ,इसलिए अयोध्यावासियों ने पूरे शहर को दीपकों से जगमगा दिया था।
दीपावली से दो बातों का गहरा संबंध है- एक तो लक्ष्मी पूजन और दूसरा राम का लंका विजय के बाद अयोध्या लौटना। प्रभु श्री राम के आगमन और माता सीता रुपी लक्ष्मी के आगमन के उपलक्ष्य में इस दिन पुरे देश में दीपक जलाकर और खुशिया मनाकर यह त्यौहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है ..
कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को सूर्य का तुला राशि में प्रवेश होता है। तुला राशि का स्वामी शुक्र सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला ग्रह है। यह कालपुरुष की कुंडली में धन व सप्तम भाव का स्वामी भी है अतः जब तुला राशि में सूर्य और चंद्र का मिलन होता है तब नैसर्गिक कुंडली के अनुसार चतुर्थेश (चंद्र) व पंचमेश (सूर्य) का मिलन होने से लक्ष्मी योग का उदय होता है। यह योग कार्तिक अमावस्या (दीपावली) को पड़ता है। इसलिए यह दिन अति धनदायक माना जाता है।
इस दिन जब सिंह लग्न का आरंभ होता है तब तृतीय स्थान में सूर्य और चंद्र की युति होती है। इस युति के समय साधना उपासना करने से साधक के पराक्रम में वृद्धि होती है, उसके मार्ग में आने वाली बाधाओं का निवारण होता है और सूर्य के अपनी उच्च राशि को देखने से भाग्यवृद्धि होती है। इस दृष्टि से सिंह लग्न की महत्ता अपरंपार है।
आधी रात में पड़ने के कारण इसकी विशेषता और बढ़ जाती है क्योंकि अर्धरात्रि में ही लक्ष्मी का आगमन भी माना जाता है।
‘‘अर्धरात्रे भवेव्येय लक्ष्मी राश््रयितुं गृहान्’’ अर्धरात्रि में लक्ष्मीपूजन को ब्रह्मपुराण में भी श्रेष्ठ कहा गया है।
सिंह लग्न के अतिरिक्त वृष लग्न को भी अच्छा माना जाता है।
विभिन्न लग्नों और मुहूर्तों के शुभाशुभ परिणाम :-
मेष लग्न इस लग्न में किए गए अनुष्ठानों से धन-धान्य में वृद्धि होती है।
वृष लग्न इस लग्न में किया जाने वाला कार्य असफल व घातक होता है।
मिथुन लग्न यह लग्न संतान हेतु घातक होता है।
कर्क लग्न शुभ, सफल व सर्वसिद्धिप्रदायक होता है।
सिंह लग्न: बुद्धि हेतु हानिकारक होता है।
कन्या लग्न तंत्र साधना हेतु श्रेष्ठ माना गया है।
तुला लग्न इसमें किया जाने वाला अनुष्ठान सर्वसिद्धि प्रदाता माना जाता है।
वृश्चिक लग्न यह एक श्रेष्ठ व लग्न है और इसमें अनुष्ठान करने से स्वर्ण आदि द्रव्यों की प्राप्ति होती है।
धनु लग्न यह एक अशुभ लग्न है, कई लोग देव गुरु बृहस्पति की राशी होने से इस राशी को शुभ भी मानते है
मकर लग्न शुभ व पुण्यदाता लग्न है।
कुंभ लग्न इस लग्न में साधना करने से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
मीन लग्न यह एक अशुभ लग्न है, कई लोग देव गुरु बृहस्पति की राशी होने से इस राशी को शुभ भी मानते है .
विशेष ध्यातव्य है कि महानिशा की रात्रि अति शुभ मानी गई है,
अतः इस रात्रि को किसी भी लग्न में की गई साधना का कोई दुष्परिणाम नहीं होता।

दीपावली पूजन सामग्री :-
दीपावली पूजा में माता लक्ष्मी को लाल फल ,लाल पुष्प लाल वस्त्र विशेष रूप से अर्पित करे .आज के दिन जुड़वाँ छुहारा , 1 मुखी नारियल . या जुड़वाँ केला , लाल कमल से पूजा करने का अधिक महत्व है ,स्फटिक, सोना, चांदी या ताम्र पर बना श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, दक्षिणावर्ती शंख, लघु नारियल, गोमती चक्र, 11 कौड़ियां और हल्दी की गांठ की प्राण प्रतिष्ठा करके
रखें साथ ही पंचामृत (गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर ), रोली, कलावा, सिंदूर, १ नारियल, (चावल) अक्षत, लाल वस्त्र , लाल फूल , 5 सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम या अशोक के पत्ते , चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रूई, आरती की थाली. कुशा, रक्त चंदनद, श्रीखंड चंदन. 1 चांदी का सिक्का .

माता लक्ष्मी का एक नाम चंचला है, एक घर में टिक कर नहीं बैठती। आज जो करोड़पति है एक झोंके में दिवालिया बन जाता है, निर्धन लक्ष्मीवान बन जाता है। यह सब लक्ष्मी की चंचल प्रवृत्ति के कारण ही है। जीवन में लक्ष्मी की अनिवार्यता है, धनी होना मानव जीवन की महान उपलब्धि है, गरीबी और निर्धनता जीवन का अभिशाप मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह संपन्न बने, इसके लिए वह हमेशा प्रयत्नशील रहता है।
यहां कुछ सरल प्रयोग दिए जा रहे हैं, जिन्हें जीवन में अपनाएं तो लक्ष्मी को आपके द्वार आना ही पड़ेगा। करे माँ लक्ष्मी का स्वागत 

इस प्रकार और लाये खुशियों की सौगात :-
1:-सर्वप्रथम घर के पूर्व दिशा में श्री यंत्र स्थापित करे > जिसकी साधना करने से महालक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप के साथ-साथ जीवन में उन्नति का पथ दृष्टिगोचर होता है।
2:-अपने पति हरि विष्णु के बिना लक्ष्मी किसी के भी घर स्थायी निवास नहीं करती। विष्णु जहां उपस्थित हैं, लक्ष्मी वहां स्थायी निवास करती है। जहां शालिग्राम हो, अनंत महायंत्र हो, शंख हो। शंख, शालिग्राम एवं तुलसी मिलाकर लक्ष्मीनारायण की उपस्थिति का वातावरण बनता है ।
3:- लक्ष्मी को समुद की पुत्री माना गया है। समुद्र से प्राप्त विविध रत्न उसके सहोदर हैं। इनमें प्रमुख हैं दक्षिणावर्ती शंख, मोती शंख, गोमती चक्र आदि। उनकी घर में उपस्थिति लक्ष्मी देवी को आपके घर,स्थापित होने के लिए विवश कर देती है।
4:- लक्ष्मी का नाम कमला है। लक्ष्मी को कमल सर्वाधिक प्रिय है। लक्ष्मी की साधना करते समय कमल पुष्प अर्पित करने पर, कमल गट्टे की माला से लक्ष्मी मंत्र के जप करने पर लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है। ‘श्री सूक्त’ के पद का पाठ करते हुए कमल गट्टे के एक बीज और शुद्ध घी की हवन में आहुति देना फलदायक होता है।
5:- श्री गणपति की स्थापना होने पर लक्ष्मी की पूर्ण स्थापना होती है। बिना गणपति के लक्ष्मी साधना अधूरी रहती है।
6:- महालक्ष्मी की साधना अवश्य करनी चाहिए।
इस मंत्र से करे माता लक्ष्मी का जाप कमल गट्टे की माला से।
‘‘ॐ श्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद मम गृहे आगच्छ आगच्छ महालक्ष्म्यै नमः’’
‘‘ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।’
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्ली श्रीमहालक्ष्म्यै नमः
7:-इसके अतिरिक्त हत्थाजोड़ी, बिल्ली की जेर और सिंयार सिंगी इन तीनों तांत्रिक वस्तुओं को चांदी की एक डिब्बी में रखकर उसे सिंदूर से पूरा भर दें। फिर उसे घर या पूजा कक्ष में रख दें और नित्य प्रातः काल स्नानादि कर उस डिब्बी को धूप, दीप, अगरबत्ती दिखाएं। ऐसा करने से घर या व्यापारिक प्रतिष्ठान में किया गया हर तांत्रिक प्रयोग सदा के लिए दूर हो जाएगा और स्थिर लक्ष्मी का वास होगा।
पूजा के अंत में श्री सूक्त एवं लक्ष्मी सूक्त का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। इसका पाठ निष्ठा और विश्वास के साथ करने से मां लक्ष्मी की कृपा वर्ष भर परिवार के सभी सदस्यों पर बनी रहती है तथा लक्ष्मी जी का घर में स्थायी निवास रहता है।
सबसे पहले आप सभी देशवाशियों को अंधकार पर प्रकाश के इस त्यौहार पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें ,
अधिक जानकारी के लिए मिले या संपर्क करे :- कौशल पाण्डेय +919968550003

जानिए कुछ अनुभूत प्रयोग :- Astrologer Kaushal +919968550003


जानिए कुछ अनुभूत प्रयोग
* दीपावली की सुबह को गन्ने की जड़ को लाकर रात्रि को लक्ष्मी पूजन में इसकी भी पूजा करने से धन लाभ मिलता है।
* दीपावली के शुभ मुहूर्त से प्रारम्भ करके प्रत्येक अमावस्या को किसी अपंग या विकलांग भिखारी को भोजन कराएं। धन-समृद्धि में सर्वदा ’वृद्धि होती रहेगी।
* दीपावली के दिन पति-पत्नी सुबह विष्णु मंदिर में एक साथ जाएं और वहां लक्ष्मी को वस्त्र चढ़ाएं, धन की कमी नहीं रहेगी। लक्ष्मी पूजन के समय लक्ष्मी को कमल अर्पित करें और कमल गट्टे की माला से जाप करें, लक्ष्मी अधिक प्रसन्न होती है।
* दीपावली वाले दिन दोपहर के समय पीपल के पेड़ की छाया में खड़े होकर चीनी, दूध और घी मिलाकर उसे उस वृक्ष की जड़ में डालंे, अभूतपूर्व आर्थिक समृद्धि होगी।
*यदि आप का पैसा कहीं फंस गया है तो दीपावली के दिन प्रातःकाल जल में लाल मिर्च के 21 बीज डालकर सूर्य को अर्पित करें। आप का फंसा हुआ पैसा निकल आयेगा।
* दीपावली के दिन बहेड़ा वृक्ष के फल की पूजा कर के लाल वस्त्र में रखने से धन की वृद्धि होती है।
* सिंदूर, सात कौड़ी, कमल के फूल व श्री यंत्र को किसी चाँदी के पात्र में रख कर दीपावली की रात्रि में अपने धन स्थान पर प्रतिष्ठापित करें, आर्थिक उन्नति की निरंतरता सर्वदा बनी रहेगी।
* दीपावली के शुभ मुहूर्त में साबुत नारियल को चमकीले लाल रंग के कपड़े में लपेटकर अपने धन-स्थान पर प्रतिष्ठापित करें। आर्थिक समृद्धि सर्वदा बनी रहेगी। * दीपावली के दिन गोधूलि काल में तुलसी के पौधे को जल अर्पित करने के पश्चात् उसके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें तथा इस प्रक्रिया को सात शुक्रवार तक दोहराएं। इस दौरान धूप, अगरबत्ती आदि का प्रयोग अवश्य करें, धन-समृद्धि की वृद्धि का क्रम सर्वदा चलता रहेगा।
* दीपावली के शुभ मुहूर्त में तीन पीली कौड़ी, तीन कमलगट्टे व एक साबुत सुपारी को लाल रंग के कपड़े में लपेट कर तिजोरी या धन-स्थान पर स्थापित करें तथा प्रत्येक शुक्रवार को इसे धूप व अगरबत्ती दिखाया करें। ख़ज़्ााना सर्वदा भरा रहेगा।
* कर्ज से मुक्तिः-
दीपावली की रात्रि में अशोक के वृक्ष के समक्ष गायं के घी का दीपक प्रज्वलित करें तथा इस प्रक्रिया को नित्य सात रात्रि तक दोहराते रहें। शीघ्र ही कर्ज से मुक्ति मिलने लगेगी।
* दीपावली के शुभ मुहूर्त में कौड़ी व हरसिंगार की जड़ को पीले कपड़े में लपेटकर ताबीज स्वरूप गले या अपनी दाहिनी भुजा में धारण करें। शीध्र ही कर्ज उतरने लगेगा।
* पारिवारिक-समृद्धिः- दीपावली की रात्रि में परिवार के सभी सदस्यों के सिर के ऊपर से काले तिल को सात बार उतार कर घर की पश्चिम दिशा की ओर फेंक दें। ऐसा करने से पारिवारिक सुख पर आने वाली कोई भी नकारात्मक बला शीध्र ही उतर जाती है।
* दीपावली की शाम पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल के दीपक को प्रज्वलित करें तथा इस प्रक्रिया को नियमित रूप से प्रत्येक शनिवार को दोहराते रहें। ऐसा करना पारिवारिक समृद्धि के लिए अत्यंत लाभप्रद होता है।
* दीपावली की रात्रि घर के प्रत्येक कमरे में शंख व डमरू बजाएं, घर में व्याप्त कोई भी नकारात्मक ऊर्जा शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी। दीपावली पूजन के बाद शंख और डमरू बजाने से दरिद्रता जाती है और लक्ष्मी आती है।
* शत्रु से सुरक्षाः-
दीपावली की रात्रि एक मुट्ठी उड़द के दानों पर शत्रु के नाम का मनन करके उन्हंे किसी निर्जन स्थान पर दबा दें तथा उस के ऊपर नींबू निचोड़ दें। शत्रु का क्रोध समाप्त हो जाएगा।
* दीपावली की रात्रि एक मुट्ठी शक्कर व तिल मिश्रित करें तथा शत्रु के नाम का मनन कर के उसे किसी निर्जन स्थान पर दबा दें। शत्रु के हृदय में आप के प्रति करूणा उत्पन्न होने लगेगी।
* दीपावली की रात्रि एक साबुत नींबू के ऊपर शत्रु का नाम लिखकर किसी बहते दरिया में प्रवाहित कर दें। शत्रु के हृदय में मित्रता के भाव उत्पन्न होने लगेगें। दीपावली के शुभ मुहूर्त में पीपल की जड़ को अभिमंत्रित करें तथा उसे चांदी के ताबीज़्ा में डाल कर गले में धारण करें। आपसी शत्रुता प्रेम में बदलने लगेगी।

श्री सूक्त का पाठ :- पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003

श्री सूक्त का पाठ :- पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003


कई बंधू है जो धन के कारन आज बहुत परेशान है कई ऐसे भी है जिनके पास धन है तो सुख शांति नहीं , यह एक ऐसा प्रयोग है जो इस समय सभी मानव समाज के लिए बहुत ही कारगर है , ऐसा ही कुछ प्रयोग आज सभी मानव समाज के लिए आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत करता हु।
श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनक धारा स्तोत्र एवं श्री सूक्त का पाठ माँ लक्ष्मी की उपासना के लिए किया जाता है , माँ लक्ष्मी के सभी मंत्रो का जाप कमल गट्टे की माला से करना चाहिए ,श्री सूक्त के अनुसार संसार के जितने रमणीय वस्तु, तत्व हैं, वे सभी लक्ष्मी के सूचक हैं।
श्री यंत्र, कुबेर यंत्र अथवा बीसा यंत्र रख कर पूजन करे। ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी गणेश और धन की देवी लक्ष्मी हैं। इन दोनों का संयुक्त यंत्र श्री यंत्र कहलाता है।
इस दिन इस यंत्र की स्थापना से घर में धन-संपत्ति की कमी नहीं रहती है।
दीपावली पर फैक्टरी , दुकान आदि में ‘श्री यंत्र’, और ‘कुबेर यंत्र’ की विधिवत स्थापना करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी पूजन का समय स्थिर लग्न में निर्धारित किया जाता है। वृष, सिंह, वृश्चिक और कुंभ ये चार स्थिर लग्न हैं।
दीपावली के समय रात्रि में वृष और सिंह लग्न पड़ता है वृष लग्न संध्या के कुछ उपरांत पड़ता है एवं सिंह लग्न मध्यरात्रि के आस-पास।
वृष की अपेक्षा सिंह अधिक प्रभावशाली लग्न है, अधिकांश व्यापारीगण दीपावली की रात्रि में सिंह लग्न के अंतर्गत ही लक्ष्मी पूजा किया करते हैं। वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक लक्ष्मी का स्वरूप अत्यंत व्यापक रहा है।
ऋग्वेद की ऋचाओं में ‘श्री’ का वर्णन समृद्धि एवं सौंदर्य के रूप में अनेक बार हुआ है। अथर्ववेद में ऋषि, पृथ्वी सूक्त में ‘श्री’ की प्रार्थना करते हुए कहते हैं
‘‘श्रिया मां धेहि’’ अर्थात मुझे ‘‘श्री’’ की संप्राप्ति हो।
श्री सूक्त में ‘श्री’ का आवाहन जातवेदस के साथ हुआ है। ‘जातवेदोमआवह’ जातवेदस अग्नि का नाम है। अग्नि की तेजस्विता तथा श्री की तेजस्विता में भी साम्य है। विष्णु पुराण में लक्ष्मी की अभिव्यक्ति दो रूपों में की गई दीपावली का सामान्य परिचय लक्ष्मी पूजा के उत्सव के रूप में है।
समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे, जिनमें पहले रत्न लक्ष्मी अर्थात् ‘श्री’ के प्रकट होने की अंतर्कथा वाला प्रसंग दीपावली का प्रमुख संदर्भ है।
पौराणिक महत्व के साथ यह एक व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। धन वैभव हर किसी को चाहिए, इसलिए उसी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना के लिए दीपावली का महापर्व व्यापक रूप से प्रचलित है।
दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन , श्री सूक्त का पाठ और कमलगट्टे की माला से निम्न मंत्र का जाप और हवन करने से लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होगे ,
निम्न मंत्रो की 11 माला करे इसके पश्चात किसी 108 बार निम्न मंत्र बोलकर हवन करना चाहिए
मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
मंत्र: ऊँ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।।
मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ऊँ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ऊँ मंत्र: ऊँ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
मंत्र: ऊँ श्रीं श्रियै नमः
ऊँ महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्नयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्।
दीपावली की अर्द्ध रात्रि में 11 माला ‘‘ऊँ ऐं ह्रीं कलीं चामुण्डायै विच्चे’ का जप करने से सुख-समृद्धि बढ़ती है।
कुबेर के पूजन में हल्दी, धनिया, कमल गट्टा एवं दूर्वा से युक्त चांदी के कुछ सिक्के कुबेर को अर्पित करें।
उसके बाद, यदि सुविधा हो तो, श्री सूक्त की 16 ऋचाओं का पाठ करें।
श्रीसूक्त: अर्थ सहित प्रस्तुत है
ऋग्वेद में वर्णित श्री सूक्त का पाठ इस प्रकार से है ।
श्री सूक्त का पाठ धन त्रयोदशी से भैयादूज तक पांच दिन संध्या समय किया जाए तो अति उत्तम है। धन त्रयोदशी के दिन गोधूलि वेला में साधक स्वच्छ होकर पूर्वाभिमुख होकर सफेद आसन पर बैठें।
ऋग्वेद में लिखा गया है कि यदि इन ऋचाओं का पाठ करते हुए शुद्ध घी से हवन भी किया जाए तो इसका फल द्विगुणित होता है।
सर्वप्रथम दाएं हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र से पूजन सामग्री एवं स्वयं पर छिड़कें।
मंत्र- ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः।।
अर्थ- पवित्र हो या अपवित्र अथवा किसी भी अवस्था में हो जो विष्णु भगवान का स्मरण करता है वह अंदर और बाहर से पवित्र हो जाता है।
उसके बाद निम्न मंत्रों से तीन बार आचमन करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः ऐं आत्मा तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
अर्थ- श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं आत्मा तत्व को शुद्ध करता हूं।
श्री महालक्ष्म्यै नमः ह्रीं विद्या तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा
अर्थ- श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं विद्या तत्व को शुद्ध करता हूं।
श्री महालक्ष्म्यै नमः क्लीं षिव तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा
अर्थ-श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं शिव तत्व को शुद्ध करता हूं।
तत्पश्चात् दाएं हाथ में चावल लेकर संकल्प करें
हे मां लक्ष्मी, मैं समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए श्रीसूक्त लक्ष्मी जी की जो साधना कर रहा हूं, आपकी कृपा के बिना कहां संभव है। हे माता श्री लक्ष्मी, मुझ पर प्रसन्न होकर साधना के सफल होने का आशीर्वाद दें। (हाथ के चावल भूमि पर चढ़ा दें।)
विनियोग करें (दाएं हाथ में जल लें।)
मंत्र: ॐ हिरण्यवर्णामिति पंषदषर्चस्य सूक्तस्य, श्री आनन्द, कर्दमचिक्लीत, इन्दिरासुता महाऋषयः। श्रीरग्निदेवता। आद्यस्तिस्तोनुष्टुभः चतुर्थी वृहती। पंचमी षष्ठ्यो त्रिष्टुभो, ततो अष्टावनुष्टुभः अन्त्याः प्रस्तारपंक्तिः। हिरण्यवर्णमिति बीजं, ताम् आवह जातवेद इति शक्तिः, कीर्ति ऋद्धि ददातु में इति कीलकम्। श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
(जल भूमि पर छोड़ दें।)
अर्थ- इस पंद्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त के कर्दम और चिक्लीत ऋषि हैं अर्थात् प्रथम तंत्र की इंदिरा ऋषि है, आनंद कर्दम और चिक्लीत इंदिरा पुंज है और शेष चैदह मंत्रों के द्रष्टा हैं। प्रथम तीन ऋचाओं का अनुष्टुप, चतुर्थ ऋचा का वहती, पंचम व षष्ठ ऋचा का त्रिष्टुप एवं सातवीं से चैदहवीं ऋचा का अनुष्टुप् छंद है। पंद्रह व सोलहवीं ऋचा का प्रसार भक्ति छंद है। श्री और अग्नि देवता हैं। ’हिरण्यवर्णा’ प्रथम ऋचा बीज और ’कां सोस्मितां’ चतुर्थ ऋचा शक्ति है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति के लिए विनियोग है।
(हाथ जोड़ कर लक्ष्मी जी एवं विष्णु जी का ध्यान करें।)
गुलाबी कमल दल पर बैठी हुई, पराग राशि के समान पीतवर्णा, हाथों में कमल पुष्प धारण किए हुए, मणियों युक्त अलंकारों को धारण किए हुए, समस्त लोकों की जननी श्री महालक्ष्मी की हम वंदना करते हैं।
श्री सूक्त का पाठ अर्थ सहित
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवण्र् रजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।
अर्थ- जो स्वर्ण सी कांतिमयी है, जो मन की दरिद्रता हरती है, जो स्वर्ण रजत की मालाओं से सुशोभित है, चंद्रमा के सदृश प्रकाशमान तथा प्रसन्न करने वाली है, हे जातवेदा अग्निदेव ऐसी देवी लक्ष्मी को मेरे घर बुलाएं। महत्व- स्वर्ण रजत की प्राप्ति होती है।
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामष्वं पुरुषानहम्।।
अर्थ- हे जातवेदा अग्निदेव। आप उन जगत् प्रसिद्ध लक्ष्मी जी को मेरे लिए बुलाएं जिनका आवाहन करने पर मैं स्वर्ण, गौ, अश्व और भाई, बांधव, पुत्र, पौत्र आदि को प्राप्त करूं। महत्त्व- गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है।
अष्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
अर्थ-जिस देवी के आगे घोड़े और मध्य में रथ है अथवा जिसके सम्मुख घोड़े रथ में जुते हुए हैं, ऐसे रथ में बैठी हुई हाथियों के निनाद से विश्व को प्रफुल्लित करने वाली देदीप्यमान एवं समस्त जनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मी को मैं अपने सम्मख् बुलाता हूँ आप मेरे घर में सर्वदा निवास करें।
महत्व- रत्नों की प्राप्ति होती है।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।
अर्थ- आपका क्या कहना। मुखारविंद मंद-मंद मुस्काता है, आपका स्वरूप अवर्णनीय है, आप चारों ओर से स्वर्ण से ओत प्रोत हैं और दया से आर्द्र हृदया अथवा समुद्र से उत्पन्न आर्द्र शरीर से युक्त देदीप्यमान हैं। भक्तों के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली, कमल के ऊपर विराजमान, कमल सदृश गृह में निवास करने वाली प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने पास बुलाता हूं।
महत्व- मां लक्ष्मी की दया एवं संपत्ति की प्राप्ति होती है।
चन्द्रां प्रभासां यषसां ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणं प्रपद्येअलक्ष्मीर्में नष्यतां त्वां वृणे।।
अर्थ- चंद्रमा के समान प्रभा वाली, अपनी कीर्ति से देदीप्यमान, स्वर्गलोक में इंद्रादि देवों से पूजित अत्यंत उदार कमल के मध्य रहने वाली, आश्रयदात्री आपकी मंै शरण में आता हूं। आपकी कृपा से मेरी दरिद्रता नष्ट हो।
महत्व- दरिद्रता का नाश होता है।
आदित्यवर्णे तपसोधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथबिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याष्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
अर्थ- हे सूर्य के समान कांति वाली, आपके तेज से ये वन पादप प्रकट हैं। आपके तेज से यह बिना पुष्प के फल देने वाला बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसी प्रकार आप अपने तेज से मेरी बाहृय और आभ्यंतर की दरिद्रता को नष्ट करें।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से अलक्ष्मी का पूर्ण रूप से परिहार होता है।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिष्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धि ं ददातु मे।।
अर्थ-हे लक्ष्मी। देवसखा अर्थात् श्री महादेव के सखा इंद्र के समान मणियां, संपत्ति और कीर्ति मुझे प्राप्त हो (मतांतर से - मण्णिभद्र (कुबेर के मित्र) के साथ कीर्ति अर्थात् यश मुझे प्राप्त हो) मैं इस विश्व में उत्पन्न हुआ हूं इसमें मुझे कीर्ति- समृद्धि प्रदान कर गौरवान्वित करें।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से यश और कीर्ति प्राप्त होती है।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाषयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।
अर्थ- भूख और प्यास रूपी मैल को घारण करने वाली ज्येष्ठ भगिनी अलक्ष्मी को मंै नष्ट करता हूं। हे लक्ष्मी। आप मेरे घर से अनैश्वर्य, वैभवहीनता तथा धन वृद्धि के प्रतिबंधक विघ्नों को दूर करें।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से परिवार की दरिद्रता दूर होती है।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिशिरीम ईष्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।
अर्थ- सुगंधित पुष्प के समर्पण से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी न दबने योग्य धन धान्य से सर्वदा पूर्ण कर समृद्धि देने, वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने घर में सादर बुलाता हूं।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने मात्र से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और विपुल धन प्राप्त होता है।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमषीमहि। पषूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।।
अर्थ-हे मां लक्ष्मी। आपके दिव्य प्रभाव से मैं मानसिक इच्छा एवं संकल्प, वाणी की सत्यता, गौ आदि पशुओं के रूप (अर्थात् दुग्ध-दध्यादि) एवं अन्नों के रूप (अर्थात भक्ष्य, भोज्य, चोस्य, लेह्य-चारों प्रकार के भोज्य पदार्थ) इन सभी को प्राप्त करूं। संपत्ति और यश मुझमें आश्रय लें अर्थात मैं लक्ष्मीवान् और कीर्तिवान बनूं।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से मानसिक स्थिरता, वाणी की दृढ़ता, अन्न, धन, यश, मान की प्राप्ति हो परिवार में कलह तथा दरिद्रता दूर होती है।
कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।
अर्थ- ’कर्दम’ नामक ऋषि पुत्र से लक्ष्मी प्रकृष्ट पुत्र वाली हुई हैं। हे कर्दम, तुम मुझमें निवास करो तथा कमल की माला धारण करने वाली माता लक्ष्मी को मेरे कुल में निवास कराओ।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति होती है।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।
अर्थ- जल के देवता वरुण स्निग्ध अर्थात मनोहर पदार्थों को उत्पन्न करें। लक्ष्मी के आनंद, कर्दम, चिक्लीत और श्रीत ये चार पुत्र हैं। इनमें से चिक्लीत से प्रार्थना की गई है कि हे चिक्लीत नामक लक्ष्मी पुत्र। तुम मेरे गृह में निवास करो। दिव्य गुणयुक्ता सर्वाश्रयमुता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से धन धान्य आदि की प्राप्ति होती है।
आद्र्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिड्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।
अर्थ- हे अग्निदेव। तुम मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात् दिग्गजों (हाथियों) के शुण्डाग्र से अभिशिच्यमाना (आर्द्र शरीर वाली), पुष्टि देने वाली, पीतवण्र् ा वाली, कमल की माला धारण करने वाली, जगत को प्रकाशित करने वाली प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को बुलाओ।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से पशु, पुत्र एवं बंधु बांधवों की स्मृद्धि होती है।
आद्र्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्यां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।
अर्थ- हे अग्निदेव। तुम मेरे घर में भक्तों पर सदा दर्यार्द्रचित्त अथवा समस्त भुवन जिसकी याचना करते हैं, दुष्टों को दंड देने वाली अथवा यष्टिवत् अवलंबनीया (जिस प्रकार असमर्थ पुरुष को लकड़ी का सहारा चाहिए उसी प्रकार लक्ष्मी जी के सहारे से अशक्त व्यक्ति भी संपन्न हो जाता है), सुंदर वर्ण वाली एवं स्वर्ण की माला वाली सूर्यरूपा, ऐसी प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को बुलाओ।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से स्वर्ण, संपत्ति एवं वंश की वृद्धि होती है।
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम्, यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् बिन्देयं पुषानहम्।।।
अर्थ- हे अग्निदेव। तुम मेरे यहां उन विश्वविख्यात लक्ष्मी को, जो मुझे छोड़कर अन्यत्र न जाने वाली हों, बुलाओ। जिन लक्ष्मी के द्वारा मैं स्वर्ण, उत्तम ऐश्वर्य, गौ, घोड़े और पुत्र पौत्रादि को प्राप्त करूं।
महत्व- श्री सूक्त का पाठ करने से देष, ग्राम, भूमि अर्थात-अचल संपत्ति की प्राप्ति होती है।
यः शूचीः प्रयतो भूत्वा जुहुयादज्या मन्वहम् । सूक्तम पंचदसर्च च श्रीकामः सततं जपेत् ॥ १६ ॥
अर्थ- जो मनुष्य लक्ष्मी की कामना करता हो वह पवित्र और सावधान होकर अग्नि में गोघृत का हवन और साथ ही श्री सूक्त की पंद्रह ऋचाओं का प्रतिदिन पाठ करे।
महत्व- जो भी प्राणी लक्ष्मी प्राप्ति की कामना से प्रतिदिन श्री सूक्त के द्वारा पाठ और हवन करता है एवं इसमें वर्णित बातो को अपने जीवन में उपयोग करता है उसे समृद्धिवान होने से कोई नही रोक सकता है ।

#छठ पूजन (सूर्य उपासना का महापर्व) पंडित कौशल पांडेय 09968550003

#छठ पूजन (सूर्य उपासना का महापर्व) पंडित कौशल पांडेय
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है।
 इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल सष्ठी की होती है। यह पर्व कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है ,
छठ पूजा का पर्व सूर्यदेव की आराधना का पर्व है, प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है. सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है, सुख-स्मृद्धि तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का यह त्यौहार सभी समान रूप से मनाते हैं.
प्राचीन धार्मिक संदर्भ में यदि इस पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि छठ पूजा का आरंभ महाभारत काल के समय से देखा जा सकता है. छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है तथा गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे पानी में खड़े होकर यह पूजा संपन्न कि जाती है.


छठ पूजन कैसे करे :-
छठ पूजन का पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।
छठ पूजन का दूसरा दिन
लोहंडा और खरना के रूप में कार्तिक शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाले व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में करते हैं.
छठ पूजन का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।
छठ पूजन का चौथा दिन सायंकाल अर्घ्य
छठ पूजन के चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।
छठ पूजा का आयोजन मुख्य रूप से बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग जहाँ भी रहते है बड़े ही धूम धाम से देश के कोने-कोने में सूर्य उपासना करते देखे जा सकते है ,विदेशों में रहने वाले लोग भी इस पर्व को बहुत धूम धाम से मनाते हैं.
मान्यता अनुसार सूर्य देव और छठी मइया भाई-बहन है, छठ व्रत नियम तथा निष्ठा से किया जाता है भक्ति-भाव से किए गए इस व्रत द्वारा नि:संतान को संतान सुख प्राप्त होता है. इसे करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है. छठ के दौरान लोग सूर्य देव की पूजा करतें हैं , इसके लिए जल में खड़े होकर कमर तक पानी में डूबे लोग, दीप प्रज्ज्वलित किए नाना प्रसाद से पूरित सूप उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं.

शनिवार, 10 सितंबर 2016

श्राद्ध पक्ष (कनागत) :- पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003

श्राद्ध पक्ष (कनागत) :- पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003


भाद्रपद (भादों मास) की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक कुल सोलह तिथियां श्राद्ध पक्ष की होती है। इस पक्ष में सूर्य कन्या राशि में होता है। इसीलिए इस पक्ष को कन्यागत अथवा कनागत भी कहा जाात है। श्राद्ध का ज्योतिषीय महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक महत्व अधिक है क्योंकि यह हमारी धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। पितृलोक के स्वामी अर्यमा सभी मृत (आत्मा) प्राणियों को अपने-अपने स्थान पर श्राद्ध का अवसर प्रदान करते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा हो, तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिण्ड आदि उन्हें मिलता है।

जिस तिथि में जिस पूर्वज का स्वर्गवास हुआ हो उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है जिनकी परलोक गमन तिथि ज्ञान न हो, उन सबका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।
पुराण और स्मृतिग्रंथों के अनुसार श्राद्ध कौन कर सकता है :-
किसी भी मृतक के ‘अन्तिम संस्कार’ और श्राद्धकर्म की व्यवस्था के लिए प्राचीन वैदिक ग्रन्थ ‘गरुड़पुराण’ में कौन-कौन से सदस्य पुत्र के नहीं होने पर श्राद्ध कर सकते है, उसका उल्लेख अध्याय ग्यारह के श्लोक सख्या- 11, 12, 13 और 14 में विस्तार से किया गया है, जैसे-
पुत्राभावे वधु कूर्यात ..भार्याभावे च सोदनः।
शिष्यो वा ब्राह्मणः सपिण्डो वा समाचरेत॥
ज्येष्ठस्य वा कनिष्ठस्य भ्रातृःपुत्रश्चः पौत्रके।
श्राध्यामात्रदिकम कार्य पु.त्रहीनेत खगः॥

अर्थात “ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है। अगर पत्नी भी जीवित न हो तो सगा भाई अथवा भतीजा, भानजा, नाती, पोता आदि कोई भी यह कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है। इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध व तर्पण और तिलांजली देकर मोक्ष कामना कर सकती है।
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य :-
जिन व्यक्तियों की सामान्य मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध केवल पितृ पक्ष की त्रयोदशी अथवा अमावस्या को किया जाता है। जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, सर्पदंश, हत्या, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाता है।

नवमी तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम है।
संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को किया जाता है।
पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अथवा आश्विन में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को किया जाता है।
नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को किया जाता है।

पितरों के श्राद्ध के लिए ‘गया’ को सर्वोत्तम माना गया है, इसे “तीर्थों का प्राण” तथा “पाँचवा धाम” भी कहते है।

माता के श्राद्ध के लिए काठियावाड़ में ‘सिद्धपुर’ को अत्यन्त फलदायक माना गया है। इस स्थान को ‘मातृगया’ के नाम से भी जाना जाता है।
गया में पिता का श्राद्ध करने से पितृऋण से तथा सिद्धपुर में माता का श्राद्ध करने से मातृऋण से सदा-सर्वदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।

श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण के पैर धोकर आदर सहित आसन पर बैठाना चाहिए तथा तर्जनी से चंदन-तिलक लगाना चाहिए। श्राद्धकर्म में अधिक से अधिक तीन ब्राह्मण पर्याप्त माने गये हैं।
श्राद्ध के लिए बने पकवान तैयार होने पर एक थाली में पाँच जगह थोड़े-थोड़े सभी पकवान परोसकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन, तिल ले कर पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौआ, देवता, पिपीलिका) के लिए संकल्प करना चाहिए।

पंचबलि निकालकर कौआ के निमित्त निकाला गया अन्न कौआ को, कुत्ते का अन्न कुत्ते को तथा अन्य सभी अन्न गाय को देना चाहिए। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

ब्राह्मण भोजन के पश्चात उन्हें अन्न, वस्त्र, ताम्बूल (पान का बीड़ा) एवं दक्षिणा आदि देकर तिलक कर चरणस्पर्श करना चाहिए। ब्राह्मणों के प्रस्थान उपरान्त परिवार सहित स्वयं भी भोजन करना चाहिए।

श्राद्ध के लिए शालीन, श्रेष्ठ गुणों से युक्त, शास्त्रों के ज्ञाता तथा तीन पीढि़यों से विख्यात ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए। योग्य ब्राह्मण के अभाव में भानजे, दौहित्र, दामाद, नाना, मामा, साले आदि को आमंत्रित किया जा सकता है।

श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण की जगह किसी अन्य को नहीं खिलाना चाहिए। श्राद्धभोक्ता को भी प्रथम निमंत्रण को त्यागकर किसी अन्य जगह नहीं जाना चाहिए। भोजन करते समय ब्राह्मण को मौन धारण कर भोजन करना चाहिए तथा हाथ के संकेत द्वारा अपनी इच्छा व्यक्त करनी चाहिए।

विकलांग अथवा अधिक अंगों वाला ब्राह्मण श्राद्ध के लिए वर्जित है। श्राद्धकर्ता को सम्पूर्ण पितृ पक्ष में दातौन करना, पान खाना, तेल लगाना, औषध-सेवन, क्षौरकर्म (मुण्ड़न एवं हजामत) मैथुन-क्रिया (स्त्री-प्रसंग), पराये का अन्न खाना, यात्रा करना, क्रोध करना एवं श्राद्धकर्म में शीघ्रता वर्जित है। माना जाता है कि पितृ पक्ष में मैथुन (रति-क्रीड़ा) करने से पितरों को वीर्यपान करना पड़ता है।

श्राद्धकर्ता को प्रतिदिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए स्नान के बाद तर्पण करना चाहिए। श्राद्धकर्म में दौहित्र (पुत्री का पुत्र), कुतप (मध्यान्हः का समय), काले तिल एवं कुश अत्यन्त पवित्र माने गये है। संध्या और रात्रि के समय श्राद्ध नहीं करना चाहिए, किंतु ग्रहण काल में रात्रि को भी श्राद्ध किया जा सकता है। गया, गंगा, प्रयाग, कुरुक्षेत्र तथा अन्य प्रमुख तीर्थों में श्राद्ध करने से पितर सर्वदा सन्तुष्ट रहते हैं। श्राद्धकर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है। श्राद्धकर्म से पितरों को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा प्रसन्न एवं तृप्त पितरों के आर्शीवाद से हमें सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आरोग्य तथा आनन्द की प्राप्ति होती है

ध्यान रखने योग्य तथ्य :-
श्राद्धकर्म में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है, जैसे-
श्राद्ध के दिन पवित्र भाव से पितरों के लिए भोजन बनवाएँ और श्राद्ध कर्म सम्पन्न करें।
मध्याह्न में कुश के आसन पर स्वयं बैठें और ब्राह्मण को भी बिठाएँ। एक थाली में गाय, कुत्ता और कौवे के लिए भोजन रखें। दूसरी थाली में पितरों के लिये भोजन रखें। इन दोनों थाली में भोजन समान ही रहेगा। सबसे पहले एक-एक करके गौ, कुत्ता और कौवे के लिए अंशदान करें और उसके बाद अपने पितरों का स्मरण करते हुए निम्न मंत्र का तीन बार जाप करें-
“ॐ देवाभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नम: स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते।।”

यदि उक्त विधि को करना किसी के लिए संभव न हो, तब वह जल को पात्र में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके तर्पण कर सकता है।
यदि घर में कोई भोजन बनाने वाला न हो, तो फल और मिष्ठान आदि का दान कर सकते हैं।

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पंडित कौशल पाण्डेय
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज , दिल्ली
+919968550003

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

हरतालिका तीज व्रत :- पंडित कौशल पाण्डेय+919968550003

हरतालिका तीज व्रत :-पंडित कौशल पाण्डेय


हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। हरतालिका तीज को हरितालिका तीज भी कहा जाता है।
एक बार भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।
श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।
तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण परहा।
नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।
नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।
तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।
उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।
तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।
तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।
तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।
तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।
गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।
हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका।
इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

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पंडित कौशल पाण्डेय
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज , दिल्ली
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अशुभ शुक्र ग्रह का प्रभाव व उपाय :- पण्डित कौशल पांडेय +919968550003

अशुभ शुक्र ग्रह  का प्रभाव व उपाय :- पण्डित कौशल पांडेय+919968550003




शुक्र की उत्पत्ति का पौराणिक वृत्तांत—–

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र भृगु ऋषि का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या ख्याति से हुआ जिस से धाता ,विधाता दो पुत्र व श्री नाम की कन्या का जन्म हुआ | भागवत पुराण के अनुसार भृगु ऋषि के कवि नाम के पुत्र भी हुए जो कालान्तर में शुक्राचार्य नाम से प्रसिद्ध हुए |

शुक्र का एकाक्षी होना

ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को नेत्र का कारक कहा गया है | जन्म कुंडली में शुक्र निर्बल ,अस्त ,6-8-12 वें भाव में पाप युक्त या दृष्ट हो तो जातक को नेत्र दोष होता है
पुराणों में शुक्र का स्वरूप एवम प्रकृति ——  

मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्र का वर्ण श्वेत है |गले में माला है |उनके चारों हाथों में दण्ड,रुद्राक्ष की माला ,पात्र व वर मुद्रा है |शुक्र की जलीय प्रकृति है |स्कन्द पुराण में शुक्र को वर्षा लाने वाला ग्रह कहा गया है | दैत्यों का गुरु होने के कारण इनकी भोग विलास की प्रकृति है |

ज्योतिष शास्त्र में शुक्र का स्वरूप एवम प्रकृति——-

प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शुक्र सुन्दर ,वात –कफ प्रधान , अम्लीय रूचि वाला ,सुख में आसक्त , सौम्य दृष्टि,वीर्य से पुष्ट ,रजोगुणी ,आराम पसंद, काले घुंघराले केशों वाला ,कामुक,सांवले रंग का  तथा जल तत्व पर अधिकार रखने वाला है |शुक्र एक नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। शुक्र मीन राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं जो बृहस्पति के स्वामित्व में आने वाली एक जल राशि है।

मीन राशि के अतिरिक्त शुक्र वृष तथा तुला राशि में स्थित होकर भी बलशाली हो जाते हैं जो कि इनकी अपनी राशियां हैं। कुंडली में शुक्र का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को शारीरिक रूप से सुंदर और आकर्षक बना देता है तथा उसकी इस सुंदरता और आकर्षण से सम्मोहित होकर लोग उसकी ओर खिंचे चले आते हैं तथा विशेष रूप से विपरीत लिंग के लोग। शुक्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक शेष सभी ग्रहों के जातकों की अपेक्षा अधिक सुंदर होते हैं। शुक्र के प्रबल प्रभाव वालीं महिलाएं अति आकर्षक होती हैं तथा जिस स्थान पर भी ये जाती हैं, पुरुषों की लंबी कतार इनके पीछे पड़ जाती है। शुक्र के जातक आम तौर पर फैशन जगत, सिनेमा जगत तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में सफल होते हैं जिनमें सफलता पाने के लिए शारीरिक सुंदरता को आवश्यक माना जाता है। भारतीय वैदिक ज्योतिष में शुक्र को मुख्य रूप से पति या पत्नी अथवा प्रेमी या प्रेमिका का कारक माना जाता है। कुंडली धारक के दिल से अर्थात प्रेम संबंधों से जुड़ा कोई भी मामला देखने के लिए कुंडली में इस ग्रह की स्थिति देखना अति आवश्यक हो जाता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए। शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार, नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिज़ाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।


ज्योतिष शास्त्र में शुक्र
  ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को शुभ ग्रह माना गया है | ग्रह मंडल में शुक्र को मंत्री पद प्राप्त है| यह वृष  और तुला राशियों का स्वामी है |यह मीन  राशि में उच्च का तथा कन्या राशि  में नीच का माना जाता है | तुला 20 अंश तक इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |शुक्र अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को  शुभकारक कहा गया है |जनम कुंडली में शुक्र  सप्तम भाव का कारक होता है |शुक्र  की सूर्य -चन्द्र से शत्रुता , शनि – बुध से मैत्री और गुरु – मंगल से समता है | यह स्व ,मूल त्रिकोण व उच्च,मित्र  राशि –नवांश  में ,शुक्रवार  में , राशि के मध्य  में ,चन्द्र के साथ रहने पर , वक्री होने पर ,सूर्य के आगे रहने पर ,वर्गोत्तम नवमांश में , अपरान्ह काल में ,जन्मकुंडली के तीसरे ,चौथे, छटे ( वैद्यनाथ छटे भाव में शुक्र को निष्फल मानते हैं ) व बारहवें  भाव में बलवान व शुभकारक होता है

शुक्र कन्या राशि में स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर भी शुक्र बलहीन हो जाते हैं। शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन अथवा प्रेम संबंधों में समस्याएं पैदा कर सकता है। महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन प्रणाली को कमजोर कर सकता है तथा उनके ॠतुस्राव, गर्भाशय अथवा अंडाशय पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण उन्हें संतान पैदा करनें में परेशानियां आ सकतीं हैं।

शुक्र शारीरिक सुखों के भी कारक होते हैं तथा संभोग से लेकर हार्दिक प्रेम तक सब विषयों को जानने के लिए कुंडली में शुक्र की स्थिति महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। शुक्र का प्रबल प्रभाव जातक को रसिक बना देता है तथा आम तौर पर ऐसे जातक अपने प्रेम संबंधों को लेकर   संवेदनशील होते हैं। शुक्र के जातक सुंदरता और एश्वर्यों का भोग करने में शेष सभी प्रकार के जातकों से आगे होते हैं। शरीर के अंगों में शुक्र जननांगों के कारक होते हैं तथा महिलाओं के शरीर में शुक्र प्रजनन प्रणाली का प्रतिनिधित्व भी करते हैं तथा महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर किसी बुरे ग्रह का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए। शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार, नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिजाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।

कारकत्व—-
 प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथोंके अनुसार शुक्र  स्त्री ,,काम सुख,भोग –विलास, वाहन,सौंदर्य ,काव्य रचना ,गीत –संगीत-नृत्य ,विवाह ,वशीकरण ,कोमलता,जलीय स्थान ,अभिनय ,श्वेत रंग के सभी पदार्थ ,चांदी,बसंत ऋतु ,शयनागार , ललित कलाएं,आग्नेय दिशा ,लक्ष्मी की उपासना ,वीर्य ,मनोरंजन ,हीरा ,सुगन्धित पदार्थ,अम्लीय रस और वस्त्र आभूषण इत्यादि का कारक है |

रोग —–
जन्म  कुंडली में  शुक्र  अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे -आठवें -बारहवें  भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत  या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो नेत्र रोग,  गुप्तेन्द्रीय रोग,वीर्य दोष से होने वाले रोग , प्रोस्ट्रेट ग्लैंड्स, प्रमेह,मूत्र विकार ,सुजाक , कामान्धता,श्वेत या रक्त प्रदर ,पांडु इत्यादि रोग  उत्पन्न करता है |कुंडली में शुक्र पर अशुभ राहु का विशेष प्रभाव जातक के भीतर शारीरिक वासनाओं को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है जिसके चलते जातक अपनी बहुत सी शारीरिक उर्जा तथा पैसा इन वासनाओं को पूरा करने में ही गंवा देता है जिसके कारण उसकी सेहत तथा प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा कुछेक मामलों में तो जातक किसी गुप्त रोग से पीड़ित भी हो सकता है जो कुंडली के दूसरे ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करते हुए जानलेवा भी साबित हो सकता है।

फल देने का समय—-

शुक्र अपना शुभाशुभ फल  २५ से २८ वर्ष कि आयु में ,अपने वार व होरा में ,बसंत ऋतु में,अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है | तरुणावस्था पर भी  इस का अधिकार कहा गया है |

ज्योतिषानुसार बारह भावों में शुक्र के द्वारा दिये जाने वाले फ़ल—

शुक्र के लिये ज्योतिष शास्त्रों में जो फ़ल कहे गये है वे इस प्रकार से है:-

प्रथम भाव में शुक्र—

जातक के जन्म के समय लगन में विराजमान शुक्र को पहले भाव में शुक्र की उपाधि दी गयी है। पहले भाव में शुक्र के होने से जातक सुन्दर होता है,और शुक्र जो कि भौतिक सुखों का दाता है,जातक को सुखी रखता है,शुक्र दैत्यों का राजा है इसलिये जातक को भौतिक वस्तुओं को प्रदान करता है,और जातक को शराब कबाब आदि से कोई परहेज नही होता है,जातक की रुचि कलात्मक अभिव्यक्तियों में अधिक होती है,वह सजाने और संवरने वाले कामों में दक्ष होता है,जातक को राज कार्यों के करने और राजकार्यों के अन्दर किसी न किसी प्रकार से शामिल होने में आनन्द आता है,वह अपना हुकुम चलाने की कला को जानता है,नाटक सिनेमा और टीवी मीडिया के द्वारा अपनी ही बात को रखने के उपाय करता है,अपनी उपभोग की क्षमता के कारण और रोगों पर जल्दी से विजय पाने के कारण अधिक उम्र का होता है,अपनी तरफ़ विरोधी आकर्षण होने के कारण अधिक कामी होता है,और काम सुख के लिये उसे कोई विशेष प्रयत्न नही करने पडते हैं।

द्वितीय भाव में शुक्र—

दूसरा भाव कालपुरुष का मुख कहा गया है,मुख से जातक कलात्मक बात करता है,अपनी आंखों से वह कलात्मक अभिव्यक्ति करने के अन्दर माहिर होता है,अपने चेहरे को सजा कर रखना उसकी नीयत होती है,सुन्दर भोजन और पेय पदार्थों की तरफ़ उसका रुझान होता है,अपनी वाकपटुता के कारण वह समाज और जान पहिचान वाले क्षेत्र में प्रिय होता है,संसारिक वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अपनी समझने की कला से पूर्ण होने के कारण वह विद्वान भी माना जाता है,अपनी जानपहिचान का फ़ायदा लेने के कारण वह साहसी भी होता है,लेकिन अकेला फ़ंसने के समय वह अपने को नि:सहाय भी पाता है,खाने पीने में साफ़सफ़ाई रखने के कारण वह अधिक उम्र का भी होता है।

तीसरे भाव में शुक्र—

तीसरे भाव में शुक्र के होने पर जातक को अपने को प्रदर्शित करने का चाव बचपन से ही होता है,कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार तीसरा भाव दूसरों को अपनी कला या शरीर के द्वारा कहानी नाटक और सिनेमा टीवी मीडिया के द्वारा प्रदर्शित करना भी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक अधिकतर नाटकबाज होते है,और किसी भी प्रकार के संप्रेषण को आसानी से व्यक्त कर सकते है,वे फ़टाफ़ट बिना किसी कारण के रोकर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के हंस कर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के गुस्सा भी कर सकते है,यह उनकी जन्म जात सिफ़्त का उदाहरण माना जा सकता है। अधिकतर महिला जातकों में तीसरे भाव का शुक्र बडे भाई की पत्नी के रूप में देखा जाता है,तीसरे भाव के शुक्र वाला जातक खूबशूरत जीवन साथी का पति या पत्नी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक को जीवन साथी बदलने में देर नही लगती है,चित्रकारी करने के साथ वह अपने को भावुकता के जाल में गूंथता चला जाता है,और उसी भावुकता के चलते वह अपने को अन्दर ही अन्दर जीवन साथी के प्रति बुरी भावना पैदा कर लेता है,अक्सर जीवन की अभिव्यक्तियों को प्रसारित करते करते वह थक सा जाता है,और इस शुक्र के धारक जातक आलस्य की तरफ़ जाकर अपना कीमती समय बरबाद कर लेते है,तीसरे शुक्र के कारण जातक के अन्दर चतुराई की मात्रा का प्रभाव अधिक हो जाता है,आलस्य के कारण जब वह किसी गंभीर समस्या को सुलझाने में असमर्थ होता है,तो वह अपनी चतुराई से उस समस्या को दूर करने की कोशिश करता है।

चौथे भाव में शुक्र—

चौथे भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार चन्द्रमा की कर्क राशि में होता है,जातक के अन्दर मानसिक रूप से कामवासना की अधिकता होती है,उसे ख्यालों में केवल पुरुष को नारी और नारी को पुरुष का ही क्याल रहता है,जातक आस्तिक भी होता है,परोपकारी भी होता है,लेकिन परोपकार के अन्दर स्त्री को पुरुष के प्रति और पुरुष को स्त्री के प्रति आकर्षण का भाव देखा जाता है,जातक व्यवहार कुशल भी होता है,और व्यवहार के अन्दर भी शुक्र का आकर्षण मुख्य होता है,जातक का स्वभाव और भावनायें अधिक मात्रा में होती है,वह अपने को समाज में वाहनो से युक्त सजे हुये घर से युक्त और आभूषणों से युक्त दिखाना चाहता है,अधिकतर चौथे शुक्र वाले जातकों की रहने की व्यवस्था बहुत ही सजावटी देखी जाती है,चौथे भाव के शुक्र के व्यक्ति को फ़ल और सजावटी खानों का काम करने से अच्छा फ़ायदा होता देखा गया है,पानी वाली जमीन में या रहने वाले स्थानों के अन्दर पानी की सजावटी क्रियायें पानी वाले जहाजों के काम आदि भी देखे जाते है,धनु या वृश्चिक का शुक्र अगर चौथे भाव में विराजमान होता है,तो जातक को हवाई जहाजों के अन्दर और अंतरिक्ष के अन्दर भी सफ़ल होता देखा गया है।

पंचम भाव में शुक्र—

पंचम भाव का शुक्र कविता करने के लिये अधिक प्रयुक्त माना जाता है,चन्द्रमा की राशि कर्क से दूसरा होने के कारण जातक भावना को बहुत ही सजा संवार कर कहता है,उसके शब्दों के अन्दर शैरो शायरी की पुटता का महत्व अधिक रूप से देखा जाता है,अपनी भावना के चलते जातक पूजा पाठ से अधिकतर दूर ही रहता है,उसे शिक्षा से लेकर अपने जीवन के हर पहलू में केवल भौतिकता का महत्व ही समझ में आता है,व्ह जो सामने है,उसी पर विश्वास करना आता है,आगे क्या होगा उसे इस बात का ख्याल नही आता है,वह किसी भी तरह पराशक्ति को एक ढकोसला समझता है,और अक्सर इस प्रकार के लोग अपने को कम्प्यूटर वाले खेलों और सजावटी सामानों के द्वारा धन कमाने की फ़िराक में रहते है,उनको भगवान से अधिक अपने कलाकार दिमाग पर अधिक भरोशा होता है,अधिकतर इस प्रकार के जातक अपनी उम्र की आखिरी मंजिल पर किसी न किसी कारण अपना सब कुछ गंवाकर भिखारी की तरह का जीवन निकालते देखे गये है,उनकी औलाद अधिक भौतिकता के कारण मानसिकता और रिस्तों को केवल संतुष्टि का कारण ही समझते है,और समय के रहते ही वे अपना मुंह स्वाभाविकता से फ़ेर लेते हैं।

छठे भाव में शुक्र—

छठा भाव कालपुरुष के अनुसार बुध का घर माना जाता है,और कन्या राशि का प्रभाव होने के कारण शुक्र इस स्थान में नीच का माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र वाले जातकों के जीवन साथी मोटे होते है,और आराम तलब होने के कारण छठे शुक्र वालों को अपने जीवन साथी के सभी काम करने पडते है,इस भाव के जातकों के जीवन साथी किसी न किसी प्रकार से दूसरे लोगों से अपनी शारीरिक काम संतुष्टि को पूरा करने के चक्कर में केवल इसी लिये रहते है,क्योंकि छठे शुक्र वाले जातकों के शरीर में जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी हमेशा बनी रहती है,चिढचिढापन और झल्लाहट के प्रभाव से वे घर या परिवार के अन्दर एक प्रकार से क्लेश का कारण भी बन जाते है,शरीर में शक्ति का विकास नही होने से वे पतले दुबले शरीर के मालिक होते है,यह सब उनकी माता के कारण भी माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र के जातकों की माता सजने संवरने और अपने को प्रदर्शित करने के चक्कर में अपने जीवन के अंतिम समय तक प्रयासरत रहतीं है। पिता के पास अनाप सनाप धन की आवक भी रहती है,और छठे शुक्र के जातकों के एक मौसी की भी जीवनी उसके लिये महत्वपूर्ण होती है,माता के खानदान से कोई न कोई कलाकार होता है, या मीडिया आदि में अपना काम कर रहा होता है।

सप्तम भाव में शुक्र—

सप्तम भाव में शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार अपनी ही राशि तुला में होता है,इस भाव में शुक्र जीवन साथी के रूप में अधिकतर मामलों में तीन तीन प्रेम सम्बन्ध देने का कारक होता है,इस प्रकार के प्रेम सम्बन्ध उम्र की उन्नीसवीं साल में,पच्चीसवीं साल में और इकत्तीसवीं साल में शुक्र के द्वारा प्रदान किये जाते है,इस शुक्र का प्रभाव माता की तरफ़ से उपहार में मिलता है,माता के अन्दर अति कामुकता और भौतिक सुखों की तरफ़ झुकाव का परिणाम माना जाता है,पिता की भी अधिकतर मामलों में या तो शुक्र वाले काम होते है,अथवा पिता की भी एक शादी या तो होकर छूट गयी होती है,या फ़िर दो सम्बन्ध लगातार आजीवन चला करते है,सप्तम भाव का शुक्र अपने भाव में होने के कारण महिला मित्रों को ही अपने कार्य के अन्दर भागीदारी का प्रभाव देता है। पुरुषों को सुन्दर पत्नी का प्रदायक शुक्र पत्नी को अपने से नीचे वाले प्रभावों में रखने के लिये भी उत्तरदायी माना जाता है,इस भाव का शुक्र उदारता वाली प्रकृति भी रखता है,अपने को लोकप्रिय भी बनाता है,लेकिन लोक प्रिय होने में नाम सही रूप में लिया जाये यह आवश्यक नही है,कारण यह शुक्र कामवासना की अधिकता से व्यभिचारी भी बना देता है,और दिमागी रूप से चंचल भी बनाता है,विलासिता के कारण जातक अधिकतर मामलों में कर्म हीन होकर अपने को उल्टे सीधे कामों मे लगा लेते है।
आठवें भाव में शुक्र—

आठवें भाव का शुक्र जातक को विदेश यात्रायें जरूर करवाता है,और अक्सर पहले से माता या पिता के द्वारा सम्पन्न किये गये जीवन साथी वाले रिस्ते दर किनार कर दिये जाते है,और अपनी मर्जी से अन्य रिस्ते बनाकर माता पिता के लिये एक नई मुसीबत हमेशा के लिये खडी कर दी जाती है। जातक का स्वभाव तुनक मिजाज होने के कारण माता के द्वारा जो शिक्षा दी जाती है वह समाज विरोधी ही मानी जाती है,माता के पंचम भाव में यह शुक्र होने के कारण माता को सूर्य का प्रभाव देता है,और सूर्य शुक्र की युति होने के कारण वह या तो राजनीति में चली जाती है,और राजनीति में भी सबसे नीचे वाले काम करने को मिलते है,जैसे साफ़ सफ़ाई करना आदि,माता की माता यानी जातक की नानी के लिये भी यह शुक्र अपनी गाथा के अनुसार वैध्वय प्रदान करता है,और उसे किसी न किसी प्रकार से शिक्षिका या अन्य पब्लिक वाले कार्य भी प्रदान करता है,जातक को नानी की सम्पत्ति बचपन में जरूर भोगने को मिलती है,लेकिन बडे होने के बाद जातक मंगल के घर में शुक्र के होने के बाद या तो मिलट्री में जाता है,या फ़िर किसी प्रकार की सजावटी टेकनोलोजी यानी कम्प्यूटर और अन्य आई टी वाली टेकनोलोजी में अपना नाम कमाता है। लगातार पुरुष वर्ग कामुकता की तरफ़ मन लगाने के कारण अक्सर उसके अन्दर जीवन रक्षक तत्वों की कमी हो जाती है,और वह रोगी बन जाता है,लेकिन रोग के चलते यह शुक्र जवानी के अन्दर किये गये कामों का फ़ल जरूर भुगतने के लिये जिन्दा रखता है,और किसी न किसी प्रकार के असाध्य रोग जैसे तपेदिक या सांस की बीमारी देता है,और शक्तिहीन बनाकर बिस्तर पर पडा रखता है। इस प्रकार के पुरुष वर्ग स्त्रियों पर अपना धन बरबाद करते है,और स्त्री वर्ग आभूषणो और मनोरंजन के साधनों तथा महंगे आवासों में अपना धन व्यय करती है।

नवें भाव का शुक्र—

नवें भाव का मालिक कालपुरुष के अनुसार गुरु होता है,और गुरु के घर में शुक्र के बैठ जाने से जातक के लिये शुक्र धन लक्ष्मी का कारक बन जाता है,उसके पास बाप दादा के जमाने की सम्पत्ति उपभोग करने के लिये होती है,और शादी के बाद उसके पास और धन बढने लगता है,जातक की माता को जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी होती है,और पिता को मोटापा यह शुक्र उपहार में प्रदान करता है,बाप आराम पसंद भी होता है,बाप के रहते जातक के लिये किसी प्रकार की धन वाली कमी नही रहती है,वह मनचाहे तरीके से धन का उपभोग करता है,इस प्रकार के जातकों का ध्यान शुक्र के कारण बडे रूप में बैंकिंग या धन को धन से कमाने के साधन प्रयोग करने की दक्षता ईश्वर की तरफ़ से मिलती है,वह लगातार किसी न किसी कारण से अपने को धनवान बनाने के लिये कोई कसर नही छोडता है। उसके बडे भाई की पत्नी या तो बहुत कंजूस होती है,या फ़िर धन को समेटने के कारण वह अपने परिवार से बिलग होकर जातक का साथ छोड देती है,छोटे भाई की पत्नी भी जातक के कहे अनुसार चलती है,और वह हमेशा जातक के लिये भाग्य बन कर रहती है,नवां भाव भाग्य और धर्म का माना जाता है,जातक के लिये लक्ष्मी ही भगवान होती है,और योग्यता के कारण धन ही भाग्य होता है। जातक का ध्यान धन के कारण उसकी रक्षा करने के लिये भगवान से लगा रहता है,और वह केवल पूजा पाठ केवल धन को कमाने के लिये ही करता है। सुखी जीवन जीने वाले जातक नवें शुक्र वाले ही देखे गये है,छोटे भाई की पत्नी का साथ होने के कारण छोटा भाई हमेशा साथ रहने और समय समय पर अपनी सहायता देने के लिये तत्पर रहता है।

दशम भाव का शुक्र—-

दसम भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार शनि के घर में विराजमान होता है,पिता के लिये यह शुक्र माता से शासित बताया जाता है,और माता के लिये पिता सही रूप से किसी भी काम के अन्दर हां में हां मिलाने वाला माना जाता है।छोटा भी कुकर्मी बन जाता है,और बडा भाई आरामतलब बन जाता है। जातक के पास कितने ही काम करने को मिलते है,और बहुत सी आजीविकायें उसके आसपास होती है। अक्सर दसवें भाव का शुक्र दो शादियां करवाता है,या तो एक जीवन साथी को भगवान के पास भेज देता है,अथवा किसी न किसी कारण से अलगाव करवा देता है। जातक के लिये एक ही काम अक्सर परेशान करने वाला होता है,कि कमाये हुये धन को वह शनि वाले नीचे कामों के अन्दर ही व्यय करता है,इस प्रकार के जातक दूसरों के लिये कार्य करने के लिये साधन जुटाने का काम करते है,दसवें भाव के शुक्र वाले जातक महिलाओं के लिये ही काम करने वाले माने जाते है,और किसी न किसी प्रकार से घर को सजाने वाले कलाकारी के काम,कढाई कशीदाकारी,पत्थरों को तरासने के काम आदि दसवें भाव के शुक्र के जातक के पास करने को मिलते है।

ग्यारहवें भाव का शुक्र—-

ग्यारहवां भाव संचार के देवता यूरेनस का माना जाता है,आज के युग में संचार का बोलबाला भी है,मीडिया और इन्टरनेट का कार्य इसी शुक्र की बदौलत फ़लीभूत माना जाता है,इस भाव का शुक्र जातक को विजुअल साधनों को देने में अपनी महारता को दिखाता है,जातक फ़िल्म एनीमेशन कार्टून बनाना कार्टून फ़िल्म बनाना टीवी के लिये काम करना,आदि के लिये हमेशा उत्साहित देखा जा सकता है। जातक के पिता की जुबान में धन होता है,वह किसी न किसी प्रकार से जुबान से धन कमाने का काम करता है,जातक का छोटा भाई धन कमाने के अन्दर प्रसिद्ध होता है,जातक की पत्नी अपने परिवार की तरफ़ देखने वाली होती है,और जातक की कमाई के द्वारा अपने मायके का परिवार संभालने के काम करती है। जातक का बडा भाई स्त्री से शासित होता है,जातक के बडी बहिन होती है,और वह भी अपने पति को शासित करने में अपना गौरव समझती है। जातक को जमीनी काम करने का शौक होता है,वह खेती वाली जमीनों को सम्भालने और दूध के काम करने के अन्दर अपने को उत्साहित पाता है,जातक की माता का स्वभाव भी एक प्रकार से हठीला माना जाता है,वह धन की कीमत को नही समझती है,और माया नगरी को राख के ढेर में बदलने के लिये हमेशा उत्सुक रहती है,लेकिन पिता के भाग्य से वह जितना खर्च करती है,उतना ही अधिक धन बढता चला जाता है।

बारहवें भाव में शुक्र—

बारहवें भाव के शुक्र का स्थान कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार राहु के घर में माना जाता है,राहु और शुक्र दोनो मिलकर या तो जातक को आजीवन हवा में उडाकर हवाई यात्रायें करवाया करते है,या आराम देने के बाद सोचने की क्रिया करवाने के बाद शरीर को फ़ुलाते रहते है,जातक का मोटा होना इस भाव के शुक्र की देन है,जातक का जीवन साथी सभी जातक की जिम्मेदारियां संभालने का कार्य करता है,और अपने को लगातार किसी न किसी प्रकार की बीमारियों का ग्रास बनाता चला जाता है,जातक का पिता या तो परिवार में बडा भाई होता है,और वह जातक की माता के भाग्य से धनवान होता है,पिता का धन जातक को मुफ़्त में भोगने को मिलता है,उम्र की बयालीसवीं साल तक जातक को मानसिक संतुष्टि नही मिलती है,चाहे उसके पास कितने ही साधन हों,वह किसी न किसी प्रकार से अपने को अभावग्रस्त ही मानता रहता है,और नई नई स्कीमें लगाकर बयालीस साल की उम्र तक जितना भी प्रयास कमाने के करता है,उतना ही वह पिता का धन बरबाद करता है,लेकिन माता के भाग्य से वह धन किसी न किसी कारण से बढता चला जाता है। उम्र की तीसरी सीढी पर वह धन कमाना चालू करता है,और फ़िर लगातार मरते दम तक कमाने से हार नही मानता है। जातक का बडा भाई अपने जुबान से धन कमाने का मालिक होता है,लेकिन भाभी का प्रभाव परिवार की मर्यादा को तोडने में ही रहता है,वह अपने को धन का दुश्मन समझती है,और किसी न किसी प्रकार से पारिवारिक महिलाओं से अपनी तू तू में में करती ही मिलती है,उसे बाहर जाने और विदेश की यात्रायें करने का शौक होता है,भाभी का जीवन अपनी कमजोरियों के कारण या तो अस्पताल में बीतता है,या फ़िर उसके संबन्ध किसी न किसी प्रकार से यौन सम्बन्धी बीमारियों के प्रति समाज में कार्य करने के प्रति मिलते है,वह अपने डाक्टर या महिलाओं को प्रजनन के समय सहायता देने वाली होती है। आप अन्य जानकारियों के लिये मुझे ईमेल कर सकते हैं

शुक्र का राशि फल——

जन्म कुंडली में शुक्र  का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :-

मेष में –शुक्र हो तो जातक रात्रि में अल्पदृष्टि वाला ,विरोध में तत्पर , अशांत ,ईर्ष्यालु ,वेश्यागामी ,अविश्वासी ,चोर,नीच प्रकृति का व स्त्री के कारण बंधन में जाने वाला होता है |

वृष   में  शुक्र  हो तो जातक कृषक ,गंध –माल्य-वस्त्र युक्त ,दाता,अपने बन्धुओं की पालना करने वाला, सुन्दर, धनी, अनेक विद्याओं का ज्ञाता ,सबका हित करने वाला ,गुणवान व परोपकारी होता है |

मिथुन में शुक्र  हो तो जातक विज्ञान –कला शास्त्र का ज्ञाता ,चतुरता से बोलने वाला,कृतज्ञ,  प्रसिद्ध ,सुन्दर कामी ,लेखक, कवि ,प्रेमी, सज्जन ,गीत-संगीत से धन प्राप्त करने वाला ,देव –ब्राह्मण भक्त व स्थिर मैत्री रखने वाला होता है |

कर्क में शुक्र  हो तो जातक रतिधर्मरत , पंडित, बली ,मृदु, प्रधान, इच्छित सुख व धन प्राप्त करने वाला ,सुन्दर ,डरपोक , अधिक स्त्रीसंग व मद्यपान से रोग पीड़ित होने वाला ,अपने किसी वंश दोष के कारण  दुखी होता है |

सिंह में शुक्र  हो तो जातक स्त्री सेवी ,अल्प पुत्र वाला,सुख –धन-आनंद से युक्त ,बन्धु प्रेमी ,परोपकारी, अधिक चिंताओं से रहित, गुरु –द्विज –आचार्य की सम्मति मानने वाला होता है |

कन्या में शुक्र  हो तो जातक अल्प चिंता वाला ,मृदु,निपुण, परोपकारी, कलाकुशल, स्त्री से बहुत मीठा बोलने वाला ,तीर्थ व सभा में पंडित  होता है |

तुला मे शुक्र  हो तो जातक परिश्रम से धन पैदा करने वाला ,शूर,पुष्प –सुगंध –वस्त्र प्रेमी,विदेश में तत्पर ,अपनी रक्षा करने में निपुण ,कार्यों  में चपल, धनी,पुण्यवान,शोभनीय , सौभाग्यवान , देव व द्विज की अर्चना से कीर्तिवान होता है |

वृश्चिक में शुक्र  हो तो जातक विद्वेषी ,नृशंस ,अधर्मी ,बकवास करने वाला ,शठ, भाइयों से विरक्त , अप्रशंसनीय ,पापी ,हिंसक ,दरिद्र ,नीचता में तत्पर,गुप्तांग रोगी व शत्रुनाशक होता है |

धनु में शुक्र  हो तो जातक उत्तम धर्म-कर्म-धन से युक्त ,जगत प्रिय ,सुन्दर, श्रेष्ठ, कुल में धनी ,विद्वान ,मंत्री, ऊँचा शरीर ,चतुर होता है |

मकर में  शुक्र हो तो जातक व्यय के भय से संतप्त ,दुर्बल देह ,उम्र में बड़ी स्त्री में आसक्त ,हृदय रोगी ,धन का लोभी ,लोभ वश असत्य बोल कर ठगने वाला , निपुण ,क्लीव,दूसरे के धन की इच्छुक ,दुखी ,मूढ़ ,क्लेश सहन करने वाला होता है |

कुम्भ में  शुक्र हो तो जातक उद्वेग रोग तप्त ,विफल कर्म में संलग्न ,परस्त्रीगामी ,विधर्मी,गुरु व पुत्रों से वैर करने वाला ,स्नान –भोग –वस्त्राभूषणों से रहित ,व मलिन होता है |

मीन में  शुक्र  हो तो जातक दक्ष ,दानी,गुणवान,महाधनी ,शत्रुओं को नीचा दिखाने वाला,लोक में विख्यात ,श्रेष्ठ ,विशिष्ट कार्य करने वाला ,राजा को प्रिय ,वाग्मी व बुद्धिमान ,सज्जनों से सम्मान पाने वाला ,वचन का धनी ,वंशधर व ज्ञानवान होता है |

(शुक्र पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है| )

शुक्र का सामान्य  दशा फल——

जन्म कुंडली में शुक्र स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ भावाधिपति ,षड्बली ,शुभ युक्त -दृष्ट हो तो शुक्र  की शुभ दशा में सुख साधनों में वृद्धि ,वाहन सुख ,धन ऐश्वर्य ,विवाह ,स्त्री सुख ,विद्या लाभ ,पालतू पशुओं की वृद्धि ,सरकार से सम्मान ,गीत –संगीत व अन्य ललित कलाओं में रूचि ,घर में उत्सव ,नष्ट राज्य या धन का लाभ ,मित्र –बन्धु बांधवों से समागम ,घर में लक्ष्मी की कृपा ,आधिपत्य ,उत्साह वृद्धि ,यश –कीर्ति ,श्रृंगार  में रूचि ,नाटक –काव्य रसिक साहित्य व मनोरंजन में आकर्षण ,कन्या सन्तिति की संभावना होतीहै | चांदी ,चीनी,चावल ,दूध व दूध  से बने पदार्थ,वस्त्र ,सुगन्धित द्रव्य ,वाहन सुख भोग के साधन ,आभूषण ,फैंसी आइटम्स इत्यादि के क्षेत्र में लाभ होता है |सरकारी नौकरी में पदोन्नति होती है | रुके हुए कार्य पूर्ण हो जाते हैं | जिस भाव का स्वामी शुक्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है |

यदि शुक्र अस्त ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति  पाप युक्त दृष्ट हो तो  शुक्र की अशुभ दशा में विवाह व दाम्पत्य सुख में बाधा ,धन की हानि ,घर में चोरी का भय ,गुप्तांगों में रोग,स्वजनों से द्वेष ,व्यवसाय में बाधा ,पशु धन की हानि , सिनेमा –अश्लील साहित्य अथवा काम वासना की ओर ध्यान लगे रहने के कुप्रभाव से शिक्षा  प्राप्ति में बाधा होती है | जिस भाव का स्वामी शुक्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है |

गोचर में शुक्र का प्रभाव —–

जन्म या नाम राशि से 1,2,3,4,5,8,9,11,12 वें स्थान पर शुक्र  शुभ फल देता है |शेष स्थानों पर शुक्र का भ्रमण अशुभ कारक  होता है |

जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर  शुक्र का गोचर सुख व धन का लाभ,शिक्षा में सफलता ,विवाह,आमोद-प्रमोद ,व्यापार में वृद्धि कराता है |

दूसरे स्थान पर शुक्र के गोचर से  नवीन वस्त्राभूषण ,गीत संगीत में रूचि ,परिवार सहित मनोरंजन ,धनालाभ व राज्य से सुख मिलता है |

तीसरे स्थान पर शुक्र का गोचर मित्र लाभ ,शत्रु की पराजय ,साहस वृद्धि ,शुभ समाचार प्राप्ति ,भाग्य वृद्धि ,बहन व भाई के सुख में वृद्धि व राज्य से सहयोग दिलाता  है |

चौथे स्थान पर  शुक्र के  गोचर से किसी  मनोकामना की पूर्ति ,धन लाभ ,वाहन लाभ ,आवास सुख ,सम्बन्धियों से समागम ,जन संपर्क में वृद्धि व मानसिक बल में वृद्धि होती है |

पांचवें स्थान पर  शुक्र के  गोचर से संतान सुख ,परीक्षा में सफलता ,मनोरंजन ,प्रेमी या प्रेमिका से मिलन ,सट्टा लाटरी से लाभ होता है |

छ्टे स्थान पर  शुक्र के गोचर से शत्रु वृद्धि ,रोग भय ,दुर्घटना ,स्त्री से झगडा या उसे कष्ट होता है |

सातवें स्थान पर  शुक्र के  गोचर से जननेंन्द्रिय सम्बन्धी रोग ,यात्रा में कष्ट ,स्त्री कोकष्ट या उस से विवाद ,आजीविका में बाधा होती है|

आठवें स्थान पर  शुक्र के गोचर से कष्टों की निवर्ति ,धन लाभ व सुखों में वृद्धि होती है |

नवें  स्थान पर शुक्र  के  गोचर राज्य कृपा,धार्मिक स्थल की यात्रा ,घर में मांगलिक उत्सव ,भाग्य वृद्धि होती है |

दसवें  स्थान पर शुक्र के  गोचर से मानसिक चिंता ,कलह,नौकरी व्यवसाय में विघ्न ,कार्यों में असफलता ,राज्य से परेशानी होती है |

ग्यारहवें स्थान पर शुक्र के गोचर से धन ऐश्वर्य की वृद्धि,कार्यों में सफलता, मित्रों का सहयोग मिलता है |

बारहवें स्थान पर  शुक्र के  गोचर सेअर्थ लाभ,  भोग विलास का सुख,विदेश यात्रा ,मनोरंजन का सुख प्राप्त होता है |

( गोचर में  शुक्र के उच्च ,स्व मित्र,शत्रु नीच आदि राशियों में स्थित होने पर , अन्य ग्रहों से युति ,दृष्टि के प्रभाव से , अष्टकवर्ग फल से या वेध स्थान पर शुभाशुभ ग्रह होने पर उपरोक्त गोचर फल में परिवर्तन संभव है | )

अशुभ शुक्र गृह की शान्ति के उपाय——
——-जन्मपत्रिका अथवा गोचर के शुक्र के अशुभ प्रभाव समाप्त कर उनको शुभ प्रभाव में बदलनें के लिए कुछ  ऐसे उपाय जिनको करने से आप निश्चित ही लाभान्वित होंगे। कोई भी उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम  शुक्रवार से आरम्भ करें—-
——-सदैव स्वच्छ वस्त्र पहनें तथा इत्र का प्रयोग करें।
—— स्त्री वर्ग का सदैव सम्मान करें।
——-शुक्र सम्बन्धित किसी भी वस्तु को मुफ्त में ना लें।
——भोजन से पहले गाय के लिए भोजन का कुछ हिस्सा निकालें।
——-कभी भी फटे या जलें कपड़े  नहीं पहनने चाहिए।
——-शुक्रवार को सुहागिन महिला को सुहाग सामग्री के साथ इत्र  का दान करे।

शुक्र के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है. वाहन से जुडे मामलों में भी यह उपाय लाभकारी रहते है.ग्रहों में शुक्र को विवाह व वाहन का कारक ग्रह कहा गया है.इसके साथ साथ वाहन दुर्घटना से बचने के लिये भी ये उपाय किये जा सकते है——

जन्मकालीन शुक्र निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
रत्न धारण –श्वेत रंग का  हीरा प्लैटिनम या चांदी की अंगूठी में  पूर्व फाल्गुनी ,पूर्वाषाढ़ व भरणी नक्षत्रों में जड़वा कर शुक्रवार को सूर्योदय के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले “ॐ  द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय  नमः” मन्त्र के 108  उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , श्वेत  पुष्प, अक्षत आदि से पूजन कर लें
हीरे की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न श्वेत जरकन भी धारण कर सकते हैं |

दान व्रत ,जाप –  शुक्रवार  के नमक रहित व्रत रखें ,  साथ में “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय  नमः” इस  मन्त्र का 16000 की संख्या में जाप करें |
शुक्रवार को  आटा ,चावल दूध ,दही, मिश्री ,श्वेत चन्दन ,इत्र, श्वेत रंग का वस्त्र ,चांदी इत्यादि का दान करें |
शुक्र की दान देने वाली वस्तुओं में घी व चावल   का दान किया जाता है.  इसके अतिरिक्त शुक्र क्योकि भोग-विलास के कारक ग्रह है. इसलिये सुख- आराम की वस्तुओं का भी दान किया जा सकता है. बनाव -श्रंगार की वस्तुओं का दान भी इसके अन्तर्गत किया जा सकता है ….

दान क्रिया में दान करने वाले व्यक्ति में श्रद्धा व विश्वास होना आवश्यक है. तथा यह दान व्यक्ति को अपने हाथों से करना चाहिए. दान से पहले अपने बडों का आशिर्वाद लेना उपाय की शुभता को बढाने में सहयोग करता है.

———ग्रह की वस्तुओं से स्नान करना उपायों के अन्तर्गत आता है. शुक्र का स्नान उपाय करते समय जल में बडी इलायची डालकर उबाल कर इस जल को स्नान के पानी में मिलाया जाता है . इसके बाद इस पानी से स्नान किया जाता है. स्नान करने से वस्तु का प्रभाव व्यक्ति पर प्रत्यक्ष रुप से पडता है. तथा शुक्र के दोषों का निवारण होता है. यह उपाय करते समय व्यक्ति को अपनी शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए. तथा उपाय करने कि अवधि के दौरान शुक्र देव का ध्यान करने से उपाय की शुभता में वृ्द्धि होती है. इसके दौरान शुक्र मंत्र का जाप करने से भी शुक्र के उपाय के फलों को सहयोग प्राप्त होता है

शुक्र के इस उपाय में निम्न श्लोक का पाठ किया जाता है—-

“ऊँ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा “

शुक्र के अशुभ गोचर की अवधि या फिर शुक्र की दशा में इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन या फिर शुक्रवार के दिन करने पर इस समय के अशुभ फलों में कमी होने की संभावना बनती है. मुंह के अशुद्ध होने पर मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए. ऎसा करने पर विपरीत फल प्राप्त हो सकते है. वैवाहिक जीवन की परेशानियों को दूर करने के लिये इस श्लोक का जाप करना लाभकारी रहता है  वाहन दुर्घटना से बचाव करने के लिये यह मंत्र लाभकारी रहता है.

-शुक्र स्त्री गृह है ,मनुष्य की कामुकता से इसका सीधा सम्बन्ध भी है ,और हर प्रकार के सौंदर्य और ऐश्वर्य से ये सीधे सम्बन्ध रखता है .शुक्र के लिए ओपल ,हीरा , स्फटिक का प्रयोग करना चहिये और यदि ये बहुत ही खराब है तो पुरुषों को अश्विनी मुद्रा या क्रिया रोज करनी चहिये .”ओम रीम दूम दुर्गाय नमः” इसकी एक  माला रोज करनी चहिये शुक्र को अच्छा करने के लिए .

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

#रक्षा बंधन :पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003

प्यार और सम्मान का पर्व रक्षा बंधन :पंडित कौशल पाण्डेय



रक्षाबन्धन का त्यौहार प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।

रक्षाबंधन के त्योहार को प्रभावशाली बनाने के लिए वेद मन्त्र का उच्चारणः करते हुए राखी बांधे , जिससे भाई बहन का पवित्र रिस्ता कायम रहे ,
आज के दिन सभी भाइयों को अपनी बहन के साथ सभी बहनो की रक्षा करने का संकल्प लेना चाहिए , जिससे समाज में माताए बहने आजादी से अपना कार्य कर सके।

राखी/रक्षाबंधन बांधने का शुभ समय
जब भी कोई कार्य शुभ समय में किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता में वृ्द्धि होती है. भाई- बहन के रिश्ते को अटूट बनाने के लिये इस राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त समय में करना चाहिए। 

राखी बांधने का मंत्र
‘येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’
इस मंत्र का अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि ने रक्षासूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया।
उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो और दृढ़ बना रहे।

इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने से पहले एक विशेष थाली सजाती है. इस थाली में 7 खास चीजें होनी चाहिए.

 1. कुमकुम, 2. चावल, 3. नारियल, 4. रक्षा सूत्र (राखी), 5. मिठाई, 7. गंगाजल से भरा कलश

पूजा की थाली में क्यो रखना चाहिए ये खास 7 चीजें -

1. कुमकुम - तिलक मान-सम्मान का भी प्रतीक है. बहन कुमकुम का तिलक लगाकर भाई के प्रति सम्मान प्रकट करती है तथा भाई की लंबी उम्र की कामना भी करती है. इसलिए थाली में कुमकुम विशेष रूप से रखना चाहिए.

2. चावल - चावल शुक्र ग्रह से भी संबंधित है. शुक्र ग्रह के प्रभाव से ही जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है. तिलक लगाने बाद तिलक के ऊपर चावल भी लगाए जाते हैं. तिलक के ऊपर चावल लगाने का भाव यह है कि भाई के जीवन पर तिलक का शुभ असर हमेशा बना रहे. तथा भाई को समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हों.

3. नारियल - बहन अपने भाई को तिलक लगाने के बाद हाथ में नारियल देती है. नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है. श्री यानी देवी लक्ष्मी का फल. यह सुख - समृद्धि का प्रतीक है. बहन भाई को नारियल देकर यह कामना करती है कि भाई के जीवन में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहे और वह लगातार उन्नति करता रहे. यह नारियल भाई को वर्षपर्यंत अपने घर मे रखना चाहिए.

4. रक्षा सूत्र (राखी) -बहन राखी बांधकर अपने भाई से उम्र भर रक्षा करने का वचन लेती हैं. भाई को भी ये रक्षा सूत्र इस बात का अहसास करवाता रहता है कि उसे हमेशा बहन की रक्षा करनी है. रक्षा सूत्र का अर्थ है, वह सूत्र (धागा) जो हमारे शरीर की रक्षा करता है. रक्षा सूत्र बांधने से त्रिदोष शांत होते हैं. त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ. हमारे शरीर में कोई भी बीमारी इन दोषों से ही संबंधित होती है. रक्षा सूत्र कलाई पर बांधने से शरीर में इन तीनों का संतुलन बना रहता है. ये धागा बांधने से कलाई की नसों पर दबाव बनता है, जिससे ये तीनों दोष निंयत्रित रहते हैं.

5. मिठाई -राखी बांधने के बाद बहन अपने भाई को मिठाई खिलाकर उसका मुंह मीठा करती है.  मिठाई खिलाना इस बात का प्रतीक है कि बहन और भाई के रिश्ते में कभी कड़वाहट न आए, मिठाई की तरह यह मिठास हमेशा बनी रहे.

6. दीपक -राखी बांधने के बाद बहन दीपक जलाकर भाई की आरती भी उतारती है. इस संबंध में मान्यता है कि आरती उतारने से सभी प्रकार की बुरी नजरों से भाई की रक्षा हो जाती है. आरती उतारकर बहन कामना करती है कि भाई हमेशा स्वस्थ और सुखी रहे.

7. गंगाजल से भरा कलश -राखी की थाली में गंगा!जल से भरा हुआ एक कलश भी रखा जाता है. इसी जल को कुमकुम में मिलाकर तिलक लगाया जाता है. हर शुभ काम की शुरुआत में जल से भरा कलश रखा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसी कलश में सभी पवित्र तीर्थों और देवी-देवताओं का वास होता है. इस कलश की प्रभाव से भाई और बहन के जीवन में सुख और स्नेह सदैव बना रहता है.

रक्षाबंधन के पर्व की वैदिक विधि
इसके लिए 5 वस्तुओं की आवश्यकता होती है -
(1) दूर्वा (घास) ,(2) अक्षत (चावल) ,(3) केसर ,(4) चन्दन ,(5) सरसों के दाने।

🌸इन 5 वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी।
⚫इन पांच वस्तुओं का महत्त्व -
🌺(1) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो। सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बढती जाए। दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए।
🌺(2) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे ।
🌺(3) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो। उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो।
🌺(4) चन्दन - चन्दन की प्रकृति शीतल होती है और यह सुगंध देता है। उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो। साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।
🌺(5) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें।

⚫इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें इसके बाद  बहनें अपने भाई के दाहिने हाँथ में शुभ संकल्प और वैदिक मंत्र पढ़ कर करके बांधे।

रक्षासूत्र बाँधने के बाद दही और गुड़ से मुँह मीठा कराये या मिठाई खिलाये।

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पंडित कौशल पाण्डेय
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज , दिल्ली
+919968550003



Pandit Kaushal Pandey

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003  ज्योतिष शास्त्र में अनेक योग ऐसे है कि उनसे पता चलता है कि हमारे जीवन में जन्म से पू...