गुरुवार, 4 अगस्त 2016

रक्षाबंधन का महापर्व 18 अगस्त 2016

रक्षाबंधन का महापर्व 2016 :- पंडित कौशल पाण्डेय 09968550003

इस वर्ष रक्षाबंधन का त्यौहार 18 अगस्त 2016 , दिन गुरुवार  को मनाया जाएगा.
पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को दोपहर बाद से आरंभ होगा किंतु 16 :24  से 27:41 तक भद्रा व्याप्त रहेगी. इसलिए यह त्यौहार 18 अगस्त को मनाया जायेगा .
शुभ कार्य  शुभ समय में किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता में वृ्द्धि होती है. यह पर्व भी  भाई- बहन के रिश्ते को अटूट बनाता है अतः राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त समय में करना चाहिए.

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
18 अगस्त को प्रातः 5:55 से 14:56 और  13:42 से 14:56 तक का समय शुभ है .
रक्षा-बंधन का पवित्र पर्व भद्रा रहित अपराह्न व्यापिनी पूर्णिमा में करने का शास्त्र विधान है- ‘‘भद्रायां द्वे न कत्र्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा ।’’
 यदि पहले दिन अपराह्न काल भद्रा व्याप्त हो तथा दूसरे दिन उदयकालिक पूर्णिमा तिथि तीन मुहूत्र्त या तीन मुहूर्त से अधिक हो, तो उसी उदयकालिक पूर्णिमा (दूसरे दिन) के अपराह्न काल में रक्षाबंधन करना चाहिए। चाहे वह अपराह्न से पूर्व ही क्यों न समाप्त हो जाए।
‘‘ अथ रक्षाबन्धनमस्यामेव पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहूत्र्ताधिकोदय व्यापिनी अपराह्ने प्रदोषे वा कार्यम्।।’’ -धर्मसिन्धु

भाई बहन के अटूट रिश्तों का पर्व है रक्षाबंधन
भाई-बहन के बीच प्यार, मनुहार व तकरार होना एक सामान्य सी बात है। लेकिन रक्षा बंधन के दिन बहन द्वारा भाई के हाथ में बांधे जाने वाले रक्षा सूत्र में भाई के प्रति बहन के असीम स्नेह और बहन के प्रति भाई के कर्तव्यबोध को पिरोया गया है। प्रेम व कर्तव्य का यही भाव भाई-बहन के संबंधों को आजीवन मजबूती देता है। इस दिन बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है, कलाई पर रक्षा सूत्र बांध उसकी आरती कर उसके दीर्घ जीवन की कामना करती है।
भाई भी बहन की झोली उपहारों से भरते हुए संकट की हर घड़ी में सहायता के लिए तत्पर रहने का वचन देता है।

रक्षा सूत्र कैसे बांधे :-
भारतीय संस्कृति में कथा, पूजा एवं विभिन्न संस्कारों के समय रक्षा सूत्र बांधने का विशेष महत्व है।
रक्षा के तीन सूत्र होते हैं जिन्हें तीन बार लपेट कर अधोलिखित मंत्र के साथ बांधा जाता है।
येन बद्धों बली राजा दान बेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
भावार्थ :- जिस प्रकार लक्ष्मी जी ने राजा बली के हाथ में रक्षा सूत्र बांध कर अपने वचन से उन्हें बांध लिया उसी तरह मैं भी आपको अपनी रक्षा के लिए बांधती हूं।

इस रक्षा मंत्र के मूल में जो कथा आती है वह इस प्रकार है- दैत्यराज राजा बलि विष्णु का अनन्य भक्त था। एक बार देवराज इंद्र जब युद्ध में बली को नहीं हरा पाए तो वे मदद के लिए विष्णु भगवान के पास गए। विष्णु ने इंद्र व बलि के बीच समझौता कराते हुए बलि को इंद्र की ही तरह पाताल लोक का एकछत्र राज्य सौंपा और उसे अमरता का वरदान देते हुए पाताल लोक में उसके राज्य की रक्षा करने के लिए अपने वैकुंठ के राजपाट को छोड़कर स्वयं आने का वचन दिया। माता लक्ष्मी चाहती थीं कि विष्णु वैकुंठ वापस आ जाएं। इसी मंशा को लेकर माता लक्ष्मी भी एक ब्राह्मणी का वेश बनाकर राजा बलि के पास गईं और उनसे अनुरोध किया कि मेरे पति किसी जरूरी काम से बाहर देश की यात्रा पर गए हैं। जब तक वह लौट नहीं आते, मैं आपकी शरण में रहना चाहती हूं। बली ने ब्राह्मणी का प्रस्ताव खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर लक्ष्मी जी ने बलि की सुख समृद्धि की कामना के लिए उसकी कलाई में राखी बांधी।
ब्राह्मणी का आत्मीय व्यवहार बलि के अंतरतम को छू गया और उसने मन से ब्राह्मणी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया तथा राखी के बदले में उपहार स्वरूप कुछ मांगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने अपनी असली पहचान बताई और अपने वहां रुकने का कारण बताते हुए कहा कि वह अपने पति के साथ वैकुंठ वापस जाना चाहती है। बलि ने उसी समय विष्णु से वैकुंठ जाने का अनुरोध कर अपनी बहन को दिए वायदे को पूरा किया। कहा जाता है कि इसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन बहनों को घर में आमंत्रित कर राखी बंधवाने का प्रचलन चल पड़ा।

रक्षा बंधन की पावनता से यमलोक भी अछूता नहीं है।
इस दिन मृत्यु के देवता यम को उनकी बहन यमुना ने राखी बांधी और अमर होने का वरदान दिया। यम ने इस पावन दिन के महत्व को अक्षुण्ण रखते हुए घोषणा की कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से राखी बंधवाएगा और उसे रक्षा का वचन देगा वह हमेशा अमर रहेगा। एक दूसरे को स्नेह, सद्भावना एवं कर्तव्य के सूत्र में पिरोने वाले इस त्योहार के पीछे यह भाव है कि समाज में रहने वाले लोग एक दूसरे के साथ मिलजुल कर रहें और जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की रक्षा के लिए आगे आएं।
यह त्योहार भाइयों को शक्तिशाली होने का बोध कराता है।
आज फ्रेंडशिप बैंड के रूप में राखी का आधुनिक स्वरूप भी नजर आ रहा है। फ्रेंडशिप बैंड को बांधने का अर्थ है एक-दूसरे के साथ भाई-बहन का सा वर्ताव कर आपसी रिश्तों की पावनता बनाए रखना। कुल मिलाकर इस त्योहार में भारतीय संस्कृति की अनूठी छवि के दर्शन होते हैं। सभी विश्व संस्कृतियों में केवल भारतीय संस्कृति ही ऐसी है जो पुरुषों को अपने विपरीतलिंगियों को मां और बहन की नजर से देखने की दृष्टि प्रदान करती है। इस भाव को सभी को नमन करना चाहिए।


हरियाली तीज की हार्दिक बधाई :- कौशल पांडेय

हरियाली तीज की हार्दिक बधाई :- कौशल पांडेय
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। जनमानस में यह हरियाली तीज के नाम से जानी जाती है। यह मुख्यत: स्त्रियों का त्योहार है। इस समय जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं।
यह श्रावणी तीज, हरियाली और कजली तीज के रूप में भी मनायी जाती है यह त्यौहार मुख्यत: महिलाओं का त्यौहार है जिसमें महिलाएं उपवास और व्रत रखती हैं और मां गौरी की पूजा करती हैं। सावन के आते ही चारों ओर मनमोहक वातावरण की सुंदर छ्ठा फैल जाती है। श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में तृतिया तिथि को महिलाएं हरियाली तीज के रुप में मनाती हैं इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं। प्रकृति में हर तरफ हरियाली की चादर सी बिछी होती है और इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहा जाता है।
सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं। देश के पूर्वी इलाकों में इसे कजली तीज के रुप में जाना तथा अधिकतर लोग इसे हरियाली तीज के नाम से जानते हैं इस समय प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित हो जाता है जगह-जगह झूले पड़ते हैं और स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं

शनिवार, 30 जुलाई 2016

पूजा के समय भक्त का बैठने की दिशा :-पंडित कौशल पाण्डेय +919968550003

शिवलिंग पूजा के समय भक्त का बैठने की दिशा:-पंडित कौशल पाण्डेय


 शिवलिंग पूजा के समय किस दिशा और स्थान पर बैठना कामनाओं को पूरा करने की दृष्टि से विशेष फलदायी है।
1. जहां शिवलिंग स्थापित हो, उससे पूर्व दिशा की ओर चेहरा करके नहीं बैठना चाहिये क्योंकि यह दिशा भगवान शिव के आगे या सामने होती है और धार्मिक दृष्टि से देव मूर्ति या प्रतिमा का सामना या रोक ठीक नहीं होती।
2. शिवलिंग से उत्तर दिशा में भी न बैठे क्योंकि इस दिशा में भगवान शंकर का बायां अंग माना जाता है, जो शक्तिरूपा देवी उमा का स्थान है।
3. पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा की ओर नहीं बैठना चाहिए क्योंकि वह भगवान शंकर की पीठ मानी जाती है। इसलिए पीछे से देवपूजा करना शुभ फल नहीं देता।
4. इस प्रकार एक दिशा बचती है - वह है दक्षिण दिशा। इस दिशा में बैठकर पूजा, फल और इच्छापूर्ति की दृष्टि से श्रेष्ठ मानी जाती है।
5. सरल अर्थ में शिवलिंग के दक्षिण दिशा की ओर बैठकर यानि उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पूजा और अभिषेक शीघ्र फल देने वाला माना गया है। इसलिए उज्जैन के दक्षिणमुखी महाकाल और अन्य दक्षिणमुखी शिवलिंग की पूजा का बहुत धार्मिक महत्व है।
6. शिवलिंग पूजा में सही दिशा में बैठने के साथ ही भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड लगाना, रुद्राक्ष की माला पहनना और बिल्वपत्र अवश्य चढ़ाना चाहिए। अगर भस्म उपलब्ध न हो तो मिट्टी से भी मस्तक पर त्रिपुंड लगाने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि जब सारे देवता श्रावण मास में शयन करते हैं तो भोलेनाथ का अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य जागृत हो जाता है।

अधिक जानकारी के लिए मिले अथवा संपर्क करे 
पंडित कौशल पाण्डेय
श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज , दिल्ली
+919968550003


  

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

शुक्र ग्रह के सरल उपाय :- पंडित कौशल पांडेय +919968550003

शुक्र ग्रह के सरल उपाय :- पंडित कौशल पांडेय +919968550003

जीवन में कई बार कोई ग्रह अशुभ फल देता है, ऐसे में उसकी शांति आवश्यक होती है, आपके जीवन को सुखमयी बनाने के लिए कुछ सरल टोटके प्रस्तुत कर रहा हूं , इनमें से किसी एक को भी करने से आपके अशुभ फलों में कमी होकर शुभ फलों में वृद्धि होगी ।
अगर जन्म कुंडली में शुक्र अपनी दशा में अशुभ फल दे रहा है तो करे ये सरल उपाय कुछ ही दिनों में खुशिया वापस लौट आएगी
शुक्र ग्रह प्रेम का प्रतीक है. इस ग्रह के पीड़ित होने से प्यार में परेशानी , पति-पत्नी के बीच क्लेश . सम्भोग शक्ति में कमी आती है तो इसके लिए आप शुक्रवार के दिन व्रत रखें.
अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुक्र -अशुभ फल देता है।
शुक्र वृष और तुला राशि का स्वामी है , मीन राशि में शुभ और कन्या राशि में अपना अशुभ प्रभाव देता है

शुक्र ग्रह बारहवें भाव में धनदायक योग बनाता है और यदि मीन राशि में बारहवें भाव में शुक्र हो तो फिर कहना ही क्या?
कारण यह है कि शुक्र बारहवें भाव में काफी प्रसन्न रहता है क्योंकि बारहवां भाव भोग स्थान है और शुक्र भोगकारक ग्रह, इसी कारण इस भाव में शुक्र होने से भोग योग का निर्माण करता है, चंद्र कला नाड़ी की मानें तो-
व्यये स्थान गते कात्ये नीचांशक वर्जिते।
भाग्याधिपेन सदृष्टे निधि प्राप्तिने संशयः।।
यानि- शुक्र द्वादश स्थान में स्थित हो और नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो ऐसा मनुष्य निधि की प्राप्ति करता है।
अर्थात शुक्र की द्वादश स्थान में स्थिति अच्छी मानी गई है।

भावार्थ रत्नाकार में कहा गया है-
शुक्रस्य षष्ठं संस्थानं योगहं भवति ध्रुवम्।
व्यय स्थितस्य शुक्रस्य यथा योगम् वदन्ति हि।।
अर्थात – शुक्र छठे स्थान में स्थित होकर उतना ही योगप्रद है जितना की वह द्वादश भाव में स्थित होकर योगप्रद है।
उत्तरकालामृत में कहा गया है कि –
‘षष्टस्थो शुभ कृत्कविः
यानि छठे स्थान में शुक्र की स्थिति इसलिये अच्छी मानी जाती है, क्योंकि बारहवें भाव में उसकी पूर्ण दृष्टि रहती है,
जिस कारण वह भोगकारी योग बनाता है।
शुक्रवार को गाय की सेवा करें श्यामा गाय मिल जाये तो और अच्छा है , गाय के निम्मित हरा चारा या ज्वार का चारा कपिला गाय को खिलाये।
शरीर को स्वस्थ रखें प्रातः स्नान करके इत्र का प्रयोग करे।
शुक्र के लिए दूध ,दही, घी, शक्कर , रेशमी कपड़े,कपूर आदि का दान करें.
शुक्र से सम्बन्धित रत्न का दान भी लाभप्रद होता है.
ब्राह्मणों एवं गरीबों को दूध और चावल खिलाएं.
अपने भोजन में से एक हिस्सा निकालकर गाय को खिलाएं.
किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय १० वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
शुक्र के उपाय : ऊँ शुं शुक्राय नमः मंत्र का जप करें।
चांदी का कड़ा पहनें। श्रीसूक्त का पाठ करें। नेत्रहीन व्यक्तियों की सेवा करें।
शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
लाल किताब के उपाय कृपया दिन में ही करे एक उपाय पूरा हो जाने के बाद ही दूसरा उपाय करे .
उपाय कम से कम 43 दिन लगातार करे .उपाय करने में सावधानी जरुर बरते ..
बिना उचित सलाह के कोई उपाय आप को और मुस्किल में डाल सकता है, अतः ज्योतिष परामर्श ले कर ही उपाय करे।

अधिक जानकारी के लिए मिले अथवा संपर्क करे पंडित कौशल पाण्डेय श्री राम हर्षण शांति कुञ्ज , दिल्ली +919968550003

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003



 ज्योतिष शास्त्र में अनेक योग ऐसे है कि उनसे पता चलता है कि हमारे जीवन में जन्म से पूर्व या बाद में तथा किस प्रकार कौन सा दोष लगा है जिसके कारन अशांति का अनुभव होता है। पितृ दोष का सिद्धांत है – करे कोई, भरे कोई। पिता के पापों का परिणाम पुत्र को भोगना ही पड़ता है,यदि उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है तो वे प्रेत योनि में प्रवेश कर अपने ही कुल को कष्ट देना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी देखने में आता है कि हमारा कोई भी दोष नहीं होता, हमने कोई पाप कर्म नहीं किया होता, फिर भी हमें कष्ट भोगना पड़ता है। यह पितृदोष के कारण होता है। ऐसे कुछ कारण निम्न हो सकते हैं- पिता, ताया, चाचा, ससुर, माता, ताई, चाची और सास का अपमान करना, पूर्वजों का शास्त्रानुसार श्राद्ध व तर्पण न करना, पशु पक्षियों की व्यर्थ ही हत्या करना, सर्प वध करना। पितृदोष के निवारण हेतु उपाय विधिपूर्वक उपाय करने से व्यक्ति स्वयं, अपने पितरों व आने वाली पीढ़ी को इस दोष के प्रभावों से बचा सकता है। 

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य से पिता , चन्द्र से माता , गुरु से पितामह , बुध-मंगल से भाई बहन आदि के बारे में जानकारी मिलती है जैसे कुंडली में यदि कही चंद्र राहु, चंद्र केतु, चंद्र बुध, चंद्र, शनि आदि का सम्बन्ध बनता है तो मातृ पक्ष से योग बनता है या मातृ दोष कहलाते हैं। यदि चंद्र-राहु एवं सूर्य-राहु योगों को ग्रहण योग तथा बुध-राहु को जड़त्व योग कहते हैं। जन्म कुंडली के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम व दशम भावों में से किसी एक भाव पर सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि का योग हो तो जातक को पितृ दोष होता है। यह योग कुंडली के जिस भाव में होता है उसके ही अशुभ फल घटित होते हैं। प्रथम भाव में :- इसे ज्योतिष में लग्न कहते है यह शारीर का प्रतिनिधित्व करता है ,सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि आदि अशुभ योग हो तो वह व्यक्ति अशांत, गुप्त चिंता, दाम्पत्य एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ होती हैं। 

दूसरे भाव:– इस भाव से धन, परिवार आदि के बारे में पता चलता है इस भाव में यह योग बने तो परिवार में वैमनस्य व आर्थिक उलझनें हों, 
चतुर्थ भाव :- इस भाव से माता , वाहन , जमीन में पितृ योग के कारण भूमि, मकान, माता-पिता एवं गृह सुख में कमी या कष्ट होते हैं। 
 पंचम भाव में उच्च विद्या में विघ्न व संतान सुख में कमी होने के संकेत हैं। 

 सप्तम में यह योग वैवाहिक सुख में कमी करता है नवम भाव :- अगर किसी भी तरह से नवां भाव या नवें भाव का मालिक राहु या केतु से ग्रसित है तो यह सौ प्रतिशत पितृदोष के कारणों में आजाता है। 

दशम भाव :- पिता के स्थान-दशम् भाव का स्वामी 6, 8, 12 वें भाव में चला जाए एवं गुरु पापी ग्रह प्रभावित या राशि में हो साथ ही लग्न व पंचम के स्वामी पाप ग्रहों से युति करे तो ऐसी कुंडली पितृशाप दोष युक्त कहलाती है। 

सर्विस या कार्य व्यवसाय संबंधी परेशानियाँ होती हैं। किसी कुंडली में लग्नेश ग्रह यदि कोण (6,8 या 12) वें भाव में स्थित हो तथा राहु लग्न भाव में हो तब भी पितृदोष होता है। पितृयोग कारक ग्रह पर यदि त्रिक (6, 8,12) भावेश एवं भावों के स्वामी की दृष्टि अथवा युति का संबंध भी हो जाए, तो अचानक वाहनादि के कारण दुर्घटना का भय, प्रेत बाधा, ज्वर, नेत्र रोग, तरक्की में रुकावट या बनते कार्यों में विघ्न, अपयश, धन हानि आदि अनिष्ट फल होते हैं। ऐसी स्थिति में पितरों का तर्पण करने से पितृ आदि दोषों की शांति होती है। 

इन योगों के प्रभावस्वरूप भी भावेश की स्थिति अनुसार ही अशुभ फल प्रकट होते हैं। ‘श्रद्धया यत् क्रियते तत् श्राद्धम्’ पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा द्वारा हविष्ययुक्त (पिंड) प्रदान करना ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध करने से पितर संतुष्ट होते हैं और वे अपने वंशजों को दीर्घायु, प्रसिद्धि, बल-तेज एवं निरोगता के साथ-साथ सभी प्रकार के पितृ दोष से मुक्ति प्रदान करने का आशीर्वाद देते हैं। 

सरल उपाय :- 
(1) पीपल और बरगद के वृ्क्ष की पूजा करने से पितृ दोष की शान्ति होती है . या पीपल का पेड़ किसी नदी के किनारे लगायें और पूजा करें, इसके साथ ही सोमवती अमावस्या को दूध की खीर बना, पितरों को अर्पित करने से भी इस दोष में कमी होती है . या फिर प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है . 

(2) अपने माता -पिता , भाई-बहन की हरसंभव सेवा करे। 
(3) प्रत्येक अमावस्या को कंडे की धूनी लगाकर उसमें खीर का भोग लगाकर दक्षिण दिशा में पितरों का आव्हान करने व उनसे अपने कर्मों के लिये क्षमायाचना करने से भी लाभ मिलता है. 
(4) सूर्योदय के समय किसी आसन पर खड़े होकर सूर्य को निहारने, उससे शक्ति देने की प्रार्थना करने और गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य मजबूत होता है. 
(5) सोमवती अमावस्या के दिन पितृ दोष निवारण पूजा करने से भी पितृ दोष में लाभ मिलाता है , सोमवती अमावश्य के दिन या नाग पंचमी पर इसकी शांति करें आप को अवश्य लाभ होगा ,ॐ काल शर्पेभ्यो नमः… इस मंत्र को बोल कर कच्चे दूध को गंगाजल में मिलाकर उसमे काला तिल डाले और बरगद के पेड़ में दूध की धारा बनाकर ११ बार परिक्रमम करें , या शिवलिंग पर ॐ नमः शिवाय बोलकर चढ़ाये तो शार्प दोष से मुक्ति मिलेगी… (6) ‘ऊँ नवकुल नागाय विद्महे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प प्रचोदयात् – ”की एक रुद्राक्ष माला जप प्रतिदिन करें। (7))घर एवं कार्यालय, दुकान पर मोर पंख लगावें। 
 (8) शनि के दिन ताजी मूली का दान करें। कोयले, बहते जल में प्रवाहित करें। 

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सावन महीने की विशेषता

सावन महीने की विशेषता भारत वर्ष के साथ विश्व के सभी शिवालयों में श्रावण महीने में ओम नमः शिवाय , हर-हर महादेव और , बम बोल की गूँज सुनाई देनी लगती है । 


श्रावण मास में शिव परिवार का पूजन बहुत फलदायी होता है। इसलिए सावन मास का बहुत मह‍त्व है। सावन में शिव पूजा की विशेषता? : सनातन धर्म की पौराणिक मान्यता और शिव महा पुराण के अनुसार सावन का महीना देवो के देव महादेव का सबसे पप्रिय महीना है , इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, इसलिए यह महीना भोले नाथ को प्रसन्नं करने का सबसे विशेष हो गया। प्रायः सभी पुराणो तथा उपपुराणों में भगवान शिव की महिमा का अपार वर्णन है , 

शिव पुराण , वायु पुराण कूर्म पुराण, लिंग पुराण, स्कन्द पुराण तथा वामन पुराण में तो विशेष रूप से श्री शिव जी की महिमा व्याप्त है , शिवलिंग पर जल चढाने का अर्थ ब्रह्म में प्राण लीन करना है , परमैकान्तिक शिवलिंग पर मात्र बिल्वपत्र चढाने से ही शिव जी प्रसन्न हो जाते है , कहते है कि दैहिक , दैविक , भौतिक तापों से संतप्त व्यक्ति के लिए त्रिदल युक्त बिल्वपत्र से बढ़कर कुछ भी नहीं है , लौकिक जगत में यदि किसी को कोई गहरा नशा चढ़ा हो , वह तीन पत्ती बिल्वपत्र को चबा ले तो कुछ सेकेंडों में नशा उतर जायेगा , मधुमेह (सुगर ) रोग में सुबह चार-पांच बिल्वपत्र , छः सात दाने कालीमिर्च के साथ चबाने से बढ़कर कोई औषधि किसी चिकित्सा में नहीं है। शिव भगवान का ध्यान प्रायः ह्रदय में होता है यदि ह्रदय शुद्ध नहीं है काम , क्रोध , लोभादिक विकारों से दूषित है तो वहां भगवान कैसे आयेगे । जिस गंदे तालाब में सूअर , गधे , कुत्ते , गीध , कौवे , बगुले आदि लोट-लोटकर स्नान आदि कर जल दूषित करेंगे , वहां राजहंस कैसे आ सकते है अतः श्रद्धारुपी भवानी तथा विश्वास रुपी शिव के आभाव में हृदयस्थ शिव का दर्शन , संभव नहीं है । 

श्री शिव जी की प्रसन्नता के लिए तदनुसार अर्थात शिव जी के समान ही त्यागी , परोपकारी , सहिस्णुता और काम, क्रोध , लोभ आदि से शून्य होकर ह्रदय को निर्मल बनाना होगा। गोस्वामी जी ने कहा है " निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट चाल छिद्र न भावा ।" भावार्थ:-जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते। 

कैसे करे महादेव का पूजन :- सावन के महीने में भगवान शिव का एक नाम रूद्र भी है इसलिए सावन के प्रत्येक दिन रुद्राभिषेक किया जाता है शिव का प्रिय दिन सोमवार है अतः सभी शिवालयों में शिव की विशेष पूजा सावन के सोमवार को की जाती है , शिवजी का अभिषेक गंगा जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, और गन्ने के रस आदि से किया जाता है। अभिषेक के बाद शिव लिंग के ऊपर बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, नीलकमल, ऑक मदार और भांग के पत्ते के आदि से पूजा की जाती है। बेलपत्र पर सफ़ेद चन्दन से ओम नमः शिवाय या राम नाम लिख कर चढाने से महादेव अति शीघ्र प्रसन्न होते है। 

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है अतः शिव पूजा में शमी का पत्ता अवश्य चढ़ाये। 

भगवान शिव की प्रिय रात्रि :- शिव शब्द का अर्थ है 'कल्याण' और 'रा' दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है। 

'शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।' 
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है।इस सिद्धिदायक महारात्रि में व्रत पूजन और मंत्र जाप के साथ जागरण करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बँधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बँधन से मुक्ति पा जाता है। 

शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है। शिवरात्रि व्रत धर्म का उत्तम साधन : शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है। 

शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है। 

गीता में इसे स्पष्ट किया गया है- 
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः॥ 
तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहाँ शिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है। शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है। महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएँ, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएँ और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएँ व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएँ। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं। 

प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें - 
संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव॥ 

तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुःखों से दग्ध हो रहा हूँ। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें। 'ॐ नमः शिवाय' कहिए और देवादिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।

 महाकालेश्वर की पौराणिक गाथा 'अनेकानेक प्राचीन वांग्मय महाकाल की व्यापक महिमा से आपूरित हैं क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं। अवन्तिकायां विहितावतारं,मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्‌ अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं,वन्दे महाकाल महासुरेशम॥ 'अर्थात जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु मैं उन 'महाकाल' नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शंकर की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूँ। इस दिव्य पवित्र मंत्र से निःसृत अर्थध्वनि भगवान शिव के सहस्र रूपों में सर्वाधिक तेजस्वी, जागृत एवं ज्योतिर्मय स्वरूप सुपूजित श्री महाकालेश्वर की असीम, अपार महत्ता को दर्शाती है। शिव पुराण की 'कोटि-रुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण हुआ करता था। वह ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग निर्मित कर उनका प्रतिदिन पूजन किया करता था। उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर समस्त तीर्थस्थलों पर धार्मिक कर्मों को बाधित करना आरंभ कर दिया। वह अवंती नगरी में भी आया और सभी ब्राह्मणों को धर्म-कर्म छोड़ देने के लिए कहा किन्तु किसी ने उसकी आज्ञा नहीं मानी। फलस्वरूप उसने अपनी दुष्ट सेना सहित पावन ब्रह्मतेजोमयी अवंतिका में उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया। जन-साधारण त्राहि-त्राहि करने लगे और उन्होंने अपने आराध्य भगवान शंकर की शरण में जाकर प्रार्थना, स्तुति शुरू कर दी। तब जहाँ वह सात्विक ब्राह्मण पार्थिव शिव की अर्चना किया करता था, उस स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव अपने विराट स्वरूप में उसमें से प्रकट हुए। विकट रूप धारी भगवान शंकर ने भक्तजनों को आश्वस्त किया और गगनभेदी हुंकार भरी, 'मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ...' और ऐसा कहकर उन्होंने दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने अपने श्रद्धालुओं से वरदान माँगने को कहा। अवंतिकावासियों ने प्रार्थना की- 'महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव॥ अत्रैव्‌ लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव स्वदर्श कान्‌ नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥ अर्थात हे महाकाल, महादेव, दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिए, जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिए एवं अपने (इस स्वयं स्थापित स्वरूप के) दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिए। इस प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान महाकाल स्थिर रूप से वहीं विराजित हो गए और समूची अवंतिका नगरी शिवमय हो गई। शिवभक्त राजा चंद्रसेन और बालक उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज था। वह भगवान शिव का परम भक्त था। शिवगणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण उसका मित्र था। एक बार मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक अत्यंत तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की। चंद्रसेन ने इसे गले में धारण किया तो उसका प्रभामंडल तो जगमगा ही उठा, साथ ही दूरस्थ देशों में उसकी यश-कीर्ति बढ़ने लगी। उस 'मणि' को प्राप्त करने के लिए दूसरे राजाओं ने प्रयास आरंभ कर दिए। कुछ ने प्रत्यक्षतः माँग की, कुछ ने विनती की। चूँकि वह राजा की अत्यंत प्रिय वस्तु थी, अतः राजा ने वह मणि किसी को नहीं दी। अंततः उन पर मणि आकांक्षी राजाओं ने आक्रमण कर दिया। शिवभक्त चंद्रसेन भगवान महाकाल की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गया। जब चंद्रसेन समाधिस्थ था तब वहाँ कोई गोपी अपने छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन हेतु आई। बालक की उम्र थी पाँच वर्ष और गोपी विधवा थी। राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव की पूजा हेतु प्रेरित हुआ। वह कहीं से एक पाषाण ले आया और अपने घर के एकांत स्थल में बैठकर भक्तिभाव से शिवलिंग की पूजा करने लगा। कुछ देर पश्चात उसकी माता ने भोजन के लिए उसे बुलाया किन्तु वह नहीं आया। फिर बुलाया, वह फिर नहीं आया। माता स्वयं बुलाने आई तो उसने देखा बालक ध्यानमग्न बैठा है और उसकी आवाज सुन नहीं रहा है। तब क्रुद्ध हो माता ने उस बालक को पीटना शुरू कर दिया और समस्त पूजन-सामग्री उठाकर फेंक दी। ध्यान से मुक्त होकर बालक चेतना में आया तो उसे अपनी पूजा को नष्ट देखकर बहुत दुःख हुआ। अचानक उसकी व्यथा की गहराई से चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहाँ एक सुंदर मंदिर निर्मित हो गया। मंदिर के मध्य में दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा यथावत थी। उसकी माता की तंद्रा भंग हुई तो वह भी आश्चर्यचकित हो गई। राजा चंद्रसेन को जब शिवजी की अनन्य कृपा से घटित इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुँचा। अन्य राजा जो मणि हेतु युद्ध पर उतारू थे, वे भी पहुँचे। सभी ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा माँगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने गोप-बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया। ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्‌॥ एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च॥ अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम्‌ वाप्तवान्‌। एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः इह भुक्तवा खिलान्‌ भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥ अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः। प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्‌॥ अर्थात 'शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने अन्यत्र शिव पूजा को मात्र देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर शिवत्व-सर्वविध, मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी 'नंद' होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण 'कृष्ण' नाम से प्रतिष्ठित होंगे। कहा जाता है भगवान महाकाल तब ही से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल की असीम महिमा का वर्णन मिलता है। महाकाल साक्षात राजाधिराज देवता माने गए हैं। महाशिवरात्रि के दिन समूचा शहर शिवमय हो जाता है। चारों ओर बस शिव जी का ही गुंजन सुनाई देता है। सारा शहर बाराती बन शिवविवाह में शामिल होता है। अगले दिन अमावस्या को सेहरे के अत्यंत आकर्षक दर्शन होते हैं। नयनाभिराम साजसज्जा के बीच एक उत्सव धूमधाम से संपन्न होता है। भगवान शिव की यह नगरी भक्ति रस में आकंठ डूबी नजर आती है। जय-जय श्री महादेव शम्भो मृत्युंजय महाकाल अनेकानेक प्राचीन वांग्मय महाकाल की व्यापक महिमा से आपूरित हैं क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं। 

स्कन्दपुराण के अवंती खंड में, शिव पुराण (ज्ञान संहिता अध्याय 38), वराह पुराण, रुद्रयामल तंत्र, शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता के तेइसवें अध्याय तथा रुद्रसंहिता के चौदहवें अध्याय में भगवान महाकाल की अर्चना, महिमा व विधान आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। मृत्युंजय महाकाल की आराधना का मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति को बचाने में विशेष महत्व है। खासकर तब जब व्यक्ति अकाल मृत्यु का शिकार होने वाला हो। 

इस हेतु एक विशेष जाप से भगवान महाकाल का लक्षार्चन अभिषेक किया जाता है- 'ॐ ह्रीं जूं सः भूर्भुवः स्वः, ॐ त्र्यम्बकं स्यजा महे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌। उर्व्वारूकमिव बंधनान्नमृत्योर्म्मुक्षीयमामृतात्‌ ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ' इसी तरह सर्वव्याधि निवारण हेतु इस मंत्र का जाप किया जाता है। 

शिवरात्रि में शिवोत्सव समूचे उज्जैन में मनाया जाता है। इन दिनों भक्तवत्सल्य भगवान आशुतोष महाकालेश्वर का विशेष श्रृंगार किया जाता है, उन्हें विविध प्रकार के फूलों से सजाया जाता है। यहाँ तक कि भक्तजन अपनी श्रद्धा का अर्पण इतने विविध रूपों में करते है कि देखकर आश्चर्य होता है। कोई बिल्वपत्र की लंबी घनी माला चढ़ाता है। कोई बेर,संतरा, केले, और दूसरे फलों की माला लेकर आता है। कोई आँकड़ों के पत्तों पर चंदन से ॐ बना कर अर्पित करता है। औढरदानी, प्रलयंकारी, दिगम्बर भगवान शिव का यह सुहाना सुसज्जित सुंदर स्वरूप देखने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। इसे 'सेहरा' के दर्शन कहा जाता है। अंत में श्री महाकालेश्वर से परम पुनीत प्रार्थना है कि इस शिवरात्रि में इस अखिल सृष्टि पर वे प्रसन्न होकर प्राणी मात्र का कल्याण करें - 'कर-चरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम, विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व, जय-जय करुणाब्धे, श्री महादेव शम्भो॥' अर्थात हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मन से भी हमने जो अपराध किए हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको है करुणासागर महादेव शम्भो! क्षमा कीजिए, एवं आपकी जय हो, जय हो।

आप की कुंडली आप के जीवन में प्रकाश ला सकती है:- पंडित के एन पाण्डेय (कौशल) +919968550003

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जन्म पत्रिका से अनेक लाभ है ... जो इस प्रकार से है कुंडली में १२ भाव होते है प्रत्येक भाव का अपना फल है जैसे ( तन, कोष , सहोदर. मातु , सुता , रिपु, नारी और मृत्यु बतावत है , भाग्य और सर्विश लाभ और हानी ये बारह भाव कहावत है ). जो आपके जीवन को साथर्क बना सकते है..... जैसे -- 
 1-आपके जीवन में कौन कौन सी परेशानियां हैं, और कब आएगी...? , शरीर क्यों और कब साथ नहीं देता इसका पता होना चाहिए।...? इन्शान के अन्दर सभी गुण होते हुए भी वो आखिर लाचार क्यों रहता है ....? 

2- धन - सम्पति सम्बंधित जानकारी ...? 

 3- आपकी कुण्डली में कहीं दोष तो नहीं जो आपके भाई बहन के साथ सम्बन्ध खराब कर दे और साझेदारी या व्यापर करने में आप को आपर में कलह करना पड़े.,...? 

 4- मकान , वाहन, जमीन-जायदाद लेने के बाद या अचानक काम में नुक्सान या लेने के बाद भी सुख- सुविधावो में कमी या आपके घर में क्लेश क्यों रहता है ? 

 5. किस विषय को चुने जो आप को नई उचाई पर ले जायेगा...? साथ ही संतान के बारे में जाने की हमारे बच्चे दुख का कारण तो नही बन रहें हैं और आगे साथ देगे भी या नहीं .....? 

6- आपके जीवन में कौन सा बुरा वक्त कब और कैसे आएगा , कहीं आपके मित्र ही शत्रु न बन जाये , या आप का अपना ही शारीर आप का साथ न छोड़ दे .. दुर्घटना या बिमारी कैसे आ सकती है, कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसके लिए आपने अपना पूरा जीवन अच्छा करें वही आपको धोखा दें .?, 

 7- आपकी कुण्डली में शादी के बाद जीवन साथी का सुख है या नहीं और होगा भी तो कब होगी , प्रेम विवाह करने के बाद भी तलाक की मुशीबत न आये ...? 

 8- विदेश यात्रा ... कुंडली में जन्म स्थान से दूर जाने को ही विदेशा यात्रा कहते है ,,,,? अकस्मात दुर्घटना कही आप की जीवन में तो नहीं होगी....? 

9- आप का भाग्य आप का साथ देगा या नहीं , कही आप अपना कीमती समय बस यूँ ही मौज मस्ती में गुजार रहे है, आपको बहुत ज्यादा सफलता क्यों नही मिलती या कब मिलेगी ?.... 

 10- व्यापर करे तो कौन सा करें , पिता से कितना सहयोग मिलेगा , पैत्रिक सम्पति मिलेगी या नहीं ,.. 

 11- जीवन में लाभ होगा या नहीं और होगा भी तो कब होगा और कैसे या हमारे बड़े भाई - बहन या सगे सम्बन्धी साथ देगे या नहीं , ..? 

 12- भाव हमें हानी के बारे में बताता है जैसे किस कार्य को करे जिससे हमें हानी न हो या कही आपका बिज़नस पार्टनर ही आप को नुकसान न पहुंचा दे , या जिसे आप अपना समझते है वो सिर्फ आप की दौलत से प्यार करते है 

इस सब प्रश्नो का उत्तर आप की जन्मपत्रिका में पहले से होता है , आज ही अपनी जन्मकुंडली बनवाए और सभी उपाय पर अमल कर के अपने जीवन को सार्थक बनाये। सम्पूर्ण जन्म कुंडली 3100 

 संपर्क करे - पंडित के एन पाण्डेय (कौशल) 
शिव शक्ति मंदिर ब्लाक सी-8 , यमुना विहार ,दिल्ली -53 
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Pandit Kaushal Pandey

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003

पित्र दोष कारन और निवारण :- कौशल पाण्डेय +919968550003  ज्योतिष शास्त्र में अनेक योग ऐसे है कि उनसे पता चलता है कि हमारे जीवन में जन्म से पू...